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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 97

Exclusion of evidence against application of document to existing facts

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम साक्ष्य क़ानून में कॉमन-लॉ परंपरा के ‘साधारण अर्थ’ या ‘शाब्दिक नियम’ (plain meaning/literal rule) से आया है, जिसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 93 से आगे बढ़ाते हुए भारतीयह साक्ष्य अधिनियम, 2023 में समाहित किया गया है। इसका उद्देश्य लिखित दस्तावेज़ों — दानपत्र, अनुबंध, वसीयत — की निश्चितता और अन्तिमता की रक्षा करना है, ताकि लोग लिखी बात पर भरोसा कर सकें और बाद में गुप्त या भिन्न आशय के दावों से उसे न खोला जाए, खासकर तब जब शब्द पहले ही बिना किसी अस्पष्टता के वास्तविकता से मेल खाते हों।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, समान पूर्ववर्ती प्रावधान (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 93) की व्याख्या करते हुए, निरन्तर माना है कि यह नियम तभी लागू होता है जब कोई भी अस्पष्टता न हो — अर्थात दस्तावेज़ की भाषा स्पष्ट हो और तथ्यों से बिल्कुल मेल खाती हो; ऐसे में उसे बदलने या खण्डित करने हेतु बाह्य साक्ष्य वर्जित है। हालांकि, न्यायालयों ने इसे गुप्त अस्पष्टता (latent ambiguity) वाले मामलों से अलग माना है, जहाँ वर्णन एक से अधिक वस्तु पर या किसी पर भी ठीक-ठीक नहीं बैठता; ऐसे मामलों को अलग प्रावधान संचालित करते हैं जो यह स्पष्ट करने के लिए साक्ष्य की अनुमति देते हैं कि कौन-सा तथ्य अभिप्रेत था।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आप हमेशा अदालत में समझा सकते हैं कि किसी दस्तावेज़ से आपका ‘वास्तविक आशय’ क्या था, भले ही शब्द स्पष्ट हों।

    तथ्य: न्यायालयों ने ठहराया है कि जब शब्द सरल-स्पष्ट हों और तथ्यों से बिल्कुल मेल खाते हों, तो भिन्न आशय का साक्ष्य स्वीकार्य नहीं होता — लिखित शब्द प्रधान रहते हैं।

  • मिथक: यह नियम तब भी लागू होता है जब किसी दस्तावेज़ में किया गया वर्णन एक से अधिक वस्तुओं पर या किसी पर भी ठीक से नहीं बैठ सकता।

    तथ्य: यह नियम केवल तब लागू होता है जब कोई अस्पष्टता न हो; यदि वर्णन बहुवस्तु पर फिट होता हो या किसी पर भी ठीक-ठीक न बैठे, तो ऐसे संदिग्ध/अस्पष्ट दस्तावेज़ों पर लागू अलग नियम प्रभावी होते हैं।