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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 96

Exclusion of evidence to explain or amend ambiguous document

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम अंग्रेज़ी कॉमन-लॉ के पुराने विचार ‘प्रकट द्विविधा’ (patent ambiguity) से आया है—जहाँ दस्तावेज़ की उलझन केवल पढ़ने से ही साफ दिखती है; इसके विपरीत ‘गुप्त द्विविधा’ (latent ambiguity) तब सामने आती है जब दस्तावेज़ को वास्तविक तथ्यों पर लागू किया जाता है। क़ानून चाहता है कि लोग दस्तावेज़ स्पष्ट लिखें और न्यायालय किसी खराब मसौदे को अटकल, गवाही की याददाश्त, या सुविधाजनक बाहरी कथनों से दोबारा न लिख दें। यह सिद्धांत मूल Indian Evidence Act, 1872 (धारा 93) में था और लगभग यथावत Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में आगे बढ़ाया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना ग़लत है कि न्यायालय हमेशा किसी उलझे अनुबंध का अर्थ बताने को गवाह बुला सकते हैं।

    तथ्य: केवल तब, जब द्विविधा ‘गुप्त’ (latent) हो—यानी जो तथ्यों पर लागू करने तक सामने न आए—तभी बाहरी साक्ष्य मदद कर सकता है। यदि द्विविधा पढ़ते ही ‘प्रकट’ (patent) हो, तो ऐसा साक्ष्य स्वीकार्य नहीं।

  • मिथक: किसी विधिक दस्तावेज़ में खाली जगहें छोड़ देना ठीक है, बशर्ते सबको याद हो कि क्या लिखा जाना था—ऐसा कहना गलत है।

    तथ्य: क़ानून दस्तावेज़ में छोड़ी गई रिक्तताओं को भरने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं देता; जो शर्तें अस्पष्ट या अपूर्ण हैं, वे सामान्यतः जैसा लिखी हैं वैसी ही अनुपालन के योग्य नहीं मानी जातीं।