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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 95

Exclusion of evidence of oral agreement

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम पुराने अंग्रेज़ी ‘पैरोल एविडेंस रूल (parol evidence rule)’ से आया और भारत में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 92 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम [भारतीय साक्ष्य अधिनियम का नया नाम: भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भरतिया साक्ष्य अधिनियम नहीं; वर्तमान क़ानून: भारतीय साक्ष्य अधिनियम का प्रतिस्थापन—‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ का 2023 का नया नाम: ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ नहीं, बल्कि ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ का स्थानापन्न—‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023’ का सरकारी हिन्दी नाम: ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ का नया अवतार ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ नहीं; विधि द्वारा स्वीकृत आधिकारिक नाम: ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ का नया अधिनियम ‘भारत का साक्ष्य अधिनियम, 2023’ यानी ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ के स्थान पर ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’] की धारा 95) के माध्यम से मूल भाव में बिना बड़े परिवर्तन के सम्मिलित हुआ। कल्पना यह है कि एक बार पक्षकार अपनी सौदेबाज़ी को लिखित रूप दे दें, तो उस लेखन को सहमति का अंतिम और विश्वसनीय अभिलेख माना जाए—अन्यथा वादी आसानी से सुविधानुसार मौखिक ‘साइड-डील’ गढ़कर अलिखित शर्तों के बहाने असुविधाजनक लिखित प्रावधानों से बच निकलेंगे, जिससे लिखित अनुबंध निरर्थक हो जाएँगे और झूठी गवाही को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, विधि यह भी मानती है कि कठोर अनुपालन अन्याय कर सकता है, इसलिए यह धोखा, भूल, सहवर्ती विषयों पर चुप्पी, पूर्वशर्तें, बाद की मौखिक तब्दीलियाँ (जहाँ विधि लिखित रूप न माँगे), व्यापार-प्रथाएँ, और अस्पष्ट भाषा को समझाने वाले तथ्यों जैसे अपवाद प्रदान करती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की पूर्ववर्ती धारा 92 के अंतर्गत, भारतीय न्यायालयों ने बार-बार ज़ोर दिया कि यह नियम केवल ‘दस्तावेज़ के पक्षकारों के परस्पर संबंध’ तक सीमित है, बाहरी व्यक्तियों पर नहीं; और यह तभी लागू होता है जब पहले वाली धारा (अब धारा 94/95) के तहत दस्तावेज़ की शर्तें सिद्ध कर ली गई हों। Roop Kumar v. Mohan Thedani (2003) में उच्चतम न्यायालय ने इस नियम और इसके अपवादों की व्याख्या की, यह नोट करते हुए कि लेन-देन की वास्तविक प्रकृति दिखाने के लिए मौखिक साक्ष्य (जैसे यह दिखाना कि दस्तावेज़ दिखावे का था या विनिमय-परिणाम लिखित कथन से भिन्न था) अब भी स्वीकार्य हो सकता है। Bai Hira Devi v. Official Assignee of Bombay (1958) में न्यायालय ने किसी लेन-देन के सच्चे विधिक चरित्र को सिद्ध करने और दस्तावेज़ की वास्तविक शर्तों में अस्वीकार्य फेरबदल करने के बीच का अंतर स्पष्ट किया। न्यायालयों ने लगातार माना है कि दस्तावेज़ की औपचारिकता की डिग्री—साधारण नोट बनाम एक गंभीर पंजीकृत विलेख—इस बात को प्रभावित करती है कि क्या किसी मौखिक ‘रिक्ति-पूर्ति’ समझौते को सिद्ध किया जा सकता है; यह चित्रण (h) की प्रतिध्वनि है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक बार लिखित अनुबंध हो जाने पर, मौखिक समझौते कभी भी मायने नहीं रखते।

    तथ्य: कानून कुछ अपवादों की सूची देता है—धोखा, भूल, वे रिक्तियाँ जिन पर दस्तावेज़ मौन है, सौदा शुरू होने से पहले तय शर्तें, बाद की मौखिक तब्दीलियाँ (जहाँ लिखित रूप विधि से आवश्यक नहीं), व्यापार-प्रथाएँ, और दस्तावेज़ की भाषा की व्याख्या करने वाले तथ्य—जहाँ मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य है।

  • मिथक: यह धारा धोखे या भूल के शिकार लोगों को वास्तविकता सिद्ध करने से रोकती है।

    तथ्य: पहला ही प्रावधान विशेष रूप से यह सिद्ध करने की अनुमति देता है: धोखा, डराकर मजबूर करना, अवैधता, उचित हस्ताक्षर का अभाव, क्षमता का अभाव, प्रतिफल का विफल होना, या भूल—ताकि लिखित दस्तावेज़ कदाचार की ढाल न बन सकें।

  • मिथक: यह नियम दस्तावेज़ से प्रभावित हर किसी पर, बाहरी व्यक्तियों सहित, लागू होता है।

    तथ्य: यह नियम केवल ‘दस्तावेज़ के पक्षकारों या उनके हित के प्रतिनिधियों’ के बीच मौखिक साक्ष्य को सीमित करता है—यह उन तृतीय पक्षों पर लागू नहीं होता जो उस दस्तावेज़ से पराये (अजनबी) हैं।