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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 93

Presumption as to electronic records five years old

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

न्यायालयों को अक्सर ऐसे पुराने अभिलेख मिलते हैं जिनमें मूल हस्ताक्षरकर्ता या साक्षी अब उपलब्ध नहीं होते। भारतीय साक्ष्य क़ानून ने काफ़ी समय से पुराने काग़ज़ी दस्तावेज़ों के लिए इसी तरह की धारणा को मान्यता दी है (जैसे 30 वर्ष पुराने दस्तावेज़ का नियम), ताकि प्रामाणिक पुराने अभिलेख केवल इस कारण अस्वीकृत न हों कि निष्पादन का प्रत्यक्ष प्रमाण जुटाना कठिन है। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख सामान्य हुए, विधायकों ने इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों के लिए भी ऐसी ही, पर अल्प-अवधि (पाँच वर्ष, क्योंकि डिजिटल प्रणालियाँ तेज़ी से बदलती हैं) की धारणा जोड़ दी—बशर्ते अभिलेख ऐसी हिरासत से आया हो जिस पर न्यायालय भरोसा करता हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी पुरानी इलेक्ट्रॉनिक फ़ाइल स्वतः ही प्रामाणिक मानी जाएगी।

    तथ्य: न्यायालय यह धारणा तभी बनाता है जब अभिलेख कम-से-कम पाँच वर्ष पुराना हो और ऐसी हिरासत से आया हो जिसे वह उचित मानता है; फिर भी इस अनुमान को साक्ष्यों से चुनौती दी जा सकती है।