Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 90
Presumption as to electronic messages
The Court may presume that an electronic message, forwarded by the originator through an electronic mail server to the addressee to whom the message purports to be addressed corresponds with the message as fed into his computer for transmission; but the Court shall not make any presumption as to the person by whom such message was sent.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह उपबंध उस नियम को आगे बढ़ाता है जिसे ईमेल और इलेक्ट्रॉनिक संचार के प्रचलन के बाद भारतीय साक्ष्य क़ानून में (Indian Evidence Act, 1872 की धारा 88A के रूप में) जोड़ा गया था, ताकि न्यायालयों के लिए इलेक्ट्रॉनिक संदेशों पर भरोसा करना आसान हो जाए और हर तकनीकी चरण के सही काम करने का बार‑बार प्रमाण न माँगना पड़े। साथ ही, विधि‑निर्माताओं ने ‘क्या संदेश बिना बदले पहुँचा’ और ‘किसने भेजने का बटन दबाया’ — इन दोनों बातों को अलग रखा, क्योंकि ईमेल खातों को हैक किया जा सकता है, साझा किया जा सकता है, स्पूफ किया जा सकता है, या खाता‑धारक के अलावा कोई और भी पहुँचा सकता है। इसलिए यह उपबंध तकनीकी पहलू पर एक विधिक अनुमान स्थापित करता है, जबकि लेखकत्व के मानवीय प्रश्न को अन्य साक्ष्यों से सिद्ध किए जाने के लिए छोड़ देता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: एक मुद्रित ईमेल अपने‑आप यह सिद्ध कर देता है कि उसे किसने भेजा था।
तथ्य: क़ानून केवल इतना मानने देता है कि संदेश प्रसारण के दौरान बदला नहीं गया; वास्तविक प्रेषक की पहचान लॉगिन रिकॉर्ड या गवाही जैसे अन्य साक्ष्यों से सिद्ध करनी होगी।
मिथक: यह धारा सभी ईमेल साक्ष्यों को स्वतः ग्राह्य और अंतिम सिद्धांत नहीं बनाती।
तथ्य: यह संदेश‑अखंडता के बारे में एक सीमित, खंडनीय अनुमान रचती है; यह लेखकत्व की प्रामाणिकता या समग्र प्रमाण‑नियमों का सर्वव्यापी नियम नहीं है।