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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 9

When facts not otherwise relevant become relevant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

मुकदमों में अक्सर प्रत्यक्ष प्रमाण की जगह परोक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य निर्णायक होते हैं। भारतीय साक्ष्य विधि, जो Indian Evidence Act, 1872 (जिसका मसौदा Sir James Fitzjames Stephen ने तैयार किया) से चली आ रही है, यह मानती रही है कि अलिबी दर्शाने वाले तथ्य, या यह संकुचित करने वाले तथ्य कि कार्य किसने किया हो सकता है, तार्किक रूप से महत्वपूर्ण हैं, भले ही वे ‘मुख्य तथ्य’ न हों। Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की धारा 9 ने पुराने अधिनियम की धारा 11 से यह सिद्धांत लगभग ज्यों का त्यों बनाए रखा है, ताकि न्यायालय अलग-थलग तथ्यों पर नहीं, बल्कि यथार्थ-जीवन की तर्कपद्धति से संभावना और असंभावना का आकलन कर सकें।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (Indian Evidence Act, 1872 की धारा 11) के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार कहा है कि इस धारा का सावधानी से उपयोग होना चाहिए—यह हर दूर-दूर से जुड़े तथ्य के लिए दरवाज़ा नहीं खोलती, बल्कि केवल उन तथ्यों के लिए जो ‘उच्च स्तर की संभावना या असंभावना’ उत्पन्न करते हैं। उदाहरणतः अलिबी साक्ष्य इसी सिद्धांत के तहत स्वीकार किया जाता है, और न्यायालयों ने बल दिया है कि मात्र वैकल्पिक व्याख्या की संभावना काफी नहीं; तथ्य को मुख्य विवादित तथ्य की संभावना पर पर्याप्त प्रभाव डालना चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: केवल प्रत्यक्ष नेत्रसाक्षी साक्ष्य से ही मुकदमे का निर्णय किया जा सकता है।

    तथ्य: न्यायालय परोक्ष तथ्यों—जैसे अलिबी या अन्य संदिग्धों का उन्मूलन—पर भी भरोसा कर सकते हैं, यदि वे किसी विवादित तथ्य को अत्यधिक संभव या अत्यधिक असंभाव्य बना दें।

  • मिथक: अलिबी को यह सिद्ध करना ही होगा कि अभियुक्त के लिए अपराध करना शारीरिक रूप से असंभव था।

    तथ्य: क़ानून केवल इतना अपेक्षित करता है कि अलिबी अभियुक्त द्वारा अपराध करने को अत्यधिक असंभाव्य बना दे, असंभव बनाना आवश्यक नहीं है।