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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 80

Presumption as to Gazettes, newspapers, and other documents

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान अदालतों का समय बचाता है, क्योंकि स्वभावतः विश्वसनीय दस्तावेज़ों — जैसे सरकारी राजपत्र या समाचारपत्र — अथवा विधिक दायित्व के तहत नियमित रूप से संधारित आधिकारिक अभिलेखों के लिए हर बार औपचारिक प्रमाण नहीं माँगा जाता। आशय यह है कि ऐसे दस्तावेज़, विशेषकर जब सही अभिरक्षक के पास सही स्थान पर मिलें, तो उनके जाली होने की संभावना न्यूनतम होती है; इसलिए हर बार औपचारिक सबूत माँगना अनावश्यक बोझ होगा। यही सिद्धांत भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 81 में था, जिसे नयी भाषा में भरतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में आगे बढ़ाया गया है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 81) के अंतर्गत अदालतों ने कहा है कि “उचित अभिरक्षा” का अर्थ निरंतर और निष्कलंक अभिरक्षा नहीं है — बल्कि दस्तावेज़ के स्वरूप और परिस्थितियों के अनुरूप युक्तिसंगत व समझाई जा सकने वाली अभिरक्षा है। इस अनुमान के आधार पर अदालतों ने सरकारी रजिस्टरों के प्रमाणित प्रतिलिपि, राजस्व अभिलेख और राजपत्र अधिसूचनाओं को स्वीकार किया है, साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि यह अनुमान अप्रमाण्य नहीं है — पक्षकार अब भी साक्ष्य देकर इसकी वास्तविकता को चुनौती दे सकता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा का अर्थ यह नहीं है कि ऐसे दस्तावेज़ों को कभी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

    तथ्य: यह एक प्रतिवर्तनीय अनुमान है — कोई पक्ष सबूत देकर दिखा सकता है कि दस्तावेज़ जाली है या अनुचित ढंग से संधारित किया गया।

  • मिथक: कोई भी समाचारपत्र की कतरन अपने-आप उसमें प्रकाशित तथ्यों की सच्चाई सिद्ध नहीं करती।

    तथ्य: यह धारा केवल यह मानती है कि स्वयं समाचारपत्र वास्तविक है (अर्थात वह वही प्रकाशन है) — यह यह नहीं मानती कि उसके भीतर प्रकाशित तथ्य सत्य हैं।