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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 79

Presumption as to documents produced as record of evidence, etc

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 80 से विकसित है, जिसे न्यायाधीशों, दंडाधिकारियों (मजिस्ट्रेटों) या अधिकृत अधिकारियों द्वारा उनके कर्तव्यों के निर्वहन में बनाए गए आधिकारिक अभिलेखों पर विश्वास करके न्यायालयों का समय और श्रम बचाने के लिए तैयार किया गया था। ऐसे अनुमान के बिना, हर दर्ज बयान या इक़रार को हर बार प्रस्तुत किए जाने पर फिर से प्रामाणिक सिद्ध करना पड़ता, जो अव्यावहारिक होता—विशेषकर जब ऐसे अभिलेखों पर आगे की कार्यवाहियों (जैसे अपील, पुनर्विचारण, या संबद्ध मुकदमों) में बार‑बार भरोसा किया जाता है। यह अनुमान न्यायिक दक्षता और निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाता है, क्योंकि यह प्रत्यभिज्ञेय (rebuttable) है—अर्थात यदि किसी पक्ष के पास वास्तविक आधार हो तो वह दस्तावेज़ की प्रामाणिकता या परिस्थितियों की सत्यता को चुनौती दे सकता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

1872 के अधिनियम के समकक्ष प्रावधान को लागू करते हुए न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि यह अनुमान अChallenge-रहित अंतिम प्रमाण नहीं है—यह केवल प्रारम्भिक भार स्थानांतरित करता है; इसलिए जो पक्ष यह कहता है कि दस्तावेज़ जाली है, परिवर्तित है, या अनुचित तरीके से दर्ज हुआ है, वह अब भी साक्ष्य लाकर इस अनुमान का खंडन कर सकता है। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि यह अनुमान सख्ती से केवल उन्हीं दस्तावेज़ों पर लागू होता है जो इस धारा में वर्णित मापदण्ड पूरे करते हैं (समुचित हस्ताक्षर, समुचित प्राधिकार, और यह दर्शाना कि वह किसी न्यायिक या अधिकृत कार्यवाही में दर्ज सबूत या इक़रार का अभिलेख है); यदि ये औपचारिक शर्तें पूर्ण नहीं हैं तो अनुमान उत्पन्न नहीं होता और सामान्य साक्ष्य के नियम लागू होते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक बार किसी दस्तावेज़ पर यह अनुमान लागू हो जाए, तो उसे कभी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

    तथ्य: यह अनुमान प्रत्यभिज्ञेय (rebuttable) है—कोई पक्ष यह दिखाने के लिए साक्ष्य पेश कर सकता है कि दस्तावेज़ जाली है, बदला गया है, या विधि के अनुसार ठीक से दर्ज नहीं किया गया।

  • मिथक: यह अनुभाग किसी भी अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित दस्तावेज़, चाहे अनौपचारिक नोट्स ही क्यों न हों, पर लागू होता है।

    तथ्य: यह केवल उन दस्तावेज़ों पर लागू होता है जो यह दर्शाते हों कि वे सबूत का आधिकारिक अभिलेख हैं, या विधि के अनुसार लिये गए बयान/इक़रार का लेखा हैं, और जिन पर न्यायाधीश, दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) या विशिष्ट रूप से अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर हों।