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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 78

Presumption as to genuineness of certified copies

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सरकारी दफ़्तर प्रतिदिन भारी संख्या में प्रमाणपत्र और प्रमाणित प्रतियाँ (जैसे भू-अभिलेख, जन्म प्रमाणपत्र, या न्यायालयी आदेश) तैयार करते हैं, जो साक्ष्य के रूप में उपयोग होती हैं। हर एक की प्रामाणिकता बार‑बार सिद्ध करवाने की शर्त से न्यायालयों का काम ठप पड़ जाएगा और न्याय में देरी होगी। 1872 के पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 79 से चली आ रही यह व्यवस्था ठीक से प्रमाणित औपचारिक दस्तावेज़ों पर प्रथमदृष्टया भरोसा करने देती है, जबकि वास्तविक संदेह होने पर किसी पक्ष को उन्हें चुनौती देने का अवसर भी देती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 79) के तहत न्यायालयों ने माना है कि प्रामाणिकता का अनुमान तभी लागू होता है जब दस्तावेज़ क़ानून द्वारा निर्धारित रूप और विधि का मूलतः पालन करता हो—यह कोई निरपेक्ष या अप्रमाद्य (इरीबट्टेबल) अनुमान नहीं है; जालसाज़ी या विधिक अधिकार के अभाव का प्रमाण देकर इसे ख़ारिज किया जा सकता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक बार किसी सरकारी अधिकारी ने दस्तावेज़ प्रमाणित कर दिया, तो उसे न्यायालय में कभी चुनौती नहीं दी जा सकती।

    तथ्य: प्रामाणिकता के अनुमान को साक्ष्य से चुनौती देकर खंडित किया जा सकता है; यह केवल आरंभिक मान्यता है, अंतिम और अटल तथ्य नहीं।

  • मिथक: किसी भी सरकारी‑संबंधित कागज़ पर अपने‑आप यह अनुमान लागू हो जाता है।

    तथ्य: दस्तावेज़ वही होना चाहिए जिसे क़ानून विशेष रूप से साक्ष्य के रूप में स्वीकार करता है, और उसका रूप व तैयारी की विधि मूलतः विधिक मानक के अनुरूप हो—सिर्फ़ कोई भी सरकारी कागज़ पर्याप्त नहीं।