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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 58

Secondary evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

न्यायालय सामान्यतः ‘श्रेष्ठ साक्ष्य’ — यानी स्वयं मूल दस्तावेज — को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि प्रतियाँ और विवरण बदले जा सकते हैं, गलतियाँ हो सकती हैं या वे अविश्वसनीय हो सकते हैं। परंतु कई बार मूल खो जाता है, नष्ट हो जाता है, किसी अनिच्छुक व्यक्ति के पास रहता है, या परीक्षण के लिए अत्यधिक बोझिल होता है। यह प्रावधान, जो पुराने Indian Evidence Act, 1872 की Section 63 से लिया गया है (जिसकी जड़ें अंग्रेजी साक्ष्य-कानून में हैं), ठीक-ठीक बताता है कि ऐसी स्थिति में कौन से विकल्प स्वीकार्य होंगे ताकि सिर्फ मूल के अभाव में न्याय रुके नहीं, और साथ ही यह भी सुनिश्चित रहे कि जो प्रतिस्थापन साक्ष्य लिया जाए वह पर्याप्त रूप से विश्वसनीय हो.

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (Evidence Act, 1872 की Section 63) के अंतर्गत भारतीय न्यायालयों ने लगातार माना कि फोटोकॉपी, कार्बन-कॉपी और ऐसे अन्य पुनरुत्पादन तभी द्वितीयक साक्ष्य बनते हैं जब यह दिखाया जाए कि वे मूल से बनाए गए या मूल से मिलान करके सत्यापित किए गए; महज़ ‘कॉपी की कॉपी’ जिसका मिलान न हुआ हो, अस्वीकार की जाती थी। अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया कि द्वितीयक साक्ष्य तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब पक्ष पहले यह सिद्ध करे कि मूल अस्तित्व में था और क्यों प्रस्तुत नहीं किया जा सकता (यह प्राथमिक शर्त साक्ष्य-कानून के अन्य भागों में कवर है)। यही ढांचा और उदाहरण बड़े पैमाने पर Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में यथावत रखे गए, इसलिए वर्तमान न्यायिक व्याख्या आगे भी यह तय करने में मार्गदर्शन देगी कि कौन-सा द्वितीयक साक्ष्य विश्वसनीय है.

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी भी दस्तावेज़ की कोई भी प्रति अपने-आप साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होती है.

    तथ्य: केवल कुछ विशिष्ट प्रकार की प्रतियाँ ही मान्य हैं — जैसे प्रमाणित प्रतियाँ, सटीक सिद्ध हुई यांत्रिक प्रतियाँ, या वे प्रतियाँ जिनका वास्तव में मूल से मिलान किया गया हो। यूँ ही मिली या जिसका मिलान न हुआ हो, ऐसी प्रति आम तौर पर मान्य नहीं होती।

  • मिथक: यदि आप मूल प्रस्तुत नहीं कर पा रहे, तो आप उसकी फोटोकॉपी या फोटो का ही मौखिक वर्णन कर दें — इतना काफ़ी है.

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि किसी प्रति या फोटो का मौखिक वर्णन देना मूल का द्वितीयक साक्ष्य नहीं होता — मौखिक विवरण केवल वही दे सकता है जिसने वास्तविक मूल को स्वयं देखा हो.

  • मिथक: सिर्फ यह अनुभाग होने से आपको सुविधा के लिए जब चाहें मूल पेश करने से छूट नहीं मिल जाती.

    तथ्य: यह अनुभाग केवल यह परिभाषित करता है कि द्वितीयक साक्ष्य क्या-क्या है; अलग प्रावधान यह आवश्यक करते हैं कि द्वितीयक साक्ष्य स्वीकार होने से पहले आप पहले मूल के अस्तित्व को सिद्ध करें और यह भी उचित ठहराएँ कि उसे क्यों प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.