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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 42

Opinion as to existence of general custom or right, when relevant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

रिवाज़ और सामुदायिक अधिकार अक्सर कहीं लिखित रूप में नहीं मिलते—वे दीर्घकालीन आचरण और साझा सामुदायिक स्मृति से चलते हैं। उन्हें दस्तावेज़ों से साबित करना प्रायः असंभव होता है, इसलिए क़ानून न्यायालयों को समुदाय से जुड़े लोगों—जैसे बुज़ुर्ग, पड़ोसी, या लंबे समय से बसे निवासी—की सामूहिक राय और जानकारी पर भरोसा करने देता है, जो स्वाभाविक रूप से जानेंगे कि ऐसी कोई प्रथा या अधिकार मौजूद है या नहीं। यह प्रावधान पूर्ववर्ती Indian Evidence Act, 1872 के नियम की निरंतरता है, और इस व्यावहारिक सच्चाई को मान्यता देता है कि प्रचलित अधिकार औपचारिक अभिलेखों के बजाय जन-प्रतिष्ठा और सामान्य जानकारी से सिद्ध होते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने परंपरागत रूप से सामान्य प्रतिष्ठा के साक्ष्य और जानकार समुदाय-सदस्यों की राय को ऐसी प्रथाओं—जैसे चरागाह भूमि पर अधिकार, मंदिर पूजा की प्रथाएँ, या साझा जलस्रोत—को सिद्ध करने में महत्वपूर्ण माना है, विशेषकर तब जब कोई लिखित अभिलेख उपलब्ध न हो। सामान्यतः न्यायालय यह अपेक्षा करते हैं कि ऐसे मत देने वाले गवाहों का उस समुदाय या क्षेत्र से वास्तविक और दीर्घकालीन संबंध हो, ताकि उनकी राय महज़ सुनी-सुनाई बात या अनुमान न रह जाए बल्कि वास्तविक महत्व रखे।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: केवल आधिकारिक दस्तावेज़ या सरकारी अभिलेख ही किसी प्रचलित अधिकार को साबित कर सकते हैं।

    तथ्य: अदालतें लंबे समय से चली आ रही प्रथा के बारे में जानने की संभावना रखने वाले लोगों की राय पर भी भरोसा कर सकती हैं, खासकर तब जब कोई लिखित अभिलेख मौजूद न हो।

  • मिथक: यह धारा किसी भी व्यक्ति की निजी राय से ही मुक़दमे का फ़ैसला करा देती है।

    तथ्य: राय तभी प्रासंगिक है जब वह ऐसे व्यक्ति से आए जो समुदाय या क्षेत्र से अपने संबंध के कारण उस प्रथा या अधिकार के बारे में जानने की वास्तविक संभावना रखता हो।