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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 4

Relevancy of facts forming part of same transaction

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम (जिसे सामान्यतः ‘रेस जेस्टे’ सिद्धांत [res gestae] कहा जाता है) इसलिए है क्योंकि साक्ष्य को केवल विवादित क्षण तक सख्ती से सीमित कर देना न्यायालय के सामने कृत्रिम और अधूरी तस्वीर पेश करेगा। वास्तविक घटनाएँ समय के साथ खुलती हैं और उनके आसपास के शब्द, क्रियाएँ और परिस्थितियाँ केंद्रीय तथ्य को संदर्भ और अर्थ देती हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 6 से आगे बढ़कर भारतीयर साक्ष्य अधिनियम, 2023 में समाहित यह प्रावधान न्यायालयों को कृत्रिम रूप से अलग-थलग ‘स्नैपशॉट’ के बजाय पूरी सतत लेनदेन देखने देता है, ताकि स्वतःस्फूर्त कथन, संबद्ध कृत्य और जुड़े प्रसंग सत्य स्थापित करने में सहायक हों।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने लंबे समय से इस प्रावधान (पुराने साक्ष्य अधिनियम की धारा 6) की व्याख्या ‘निकटता और निरंतरता’ के दृष्टिकोण से की है, न कि केवल समयांतर के कड़े मानक से। Sukhar v. State of Uttar Pradesh तथा Rattan Singh v. State of Himachal Pradesh जैसे मामलों में न्यायालयों ने माना कि घटना के शीघ्र बाद दिए गए कथन—भले ही कथनकर्ता स्वयं कृत्य का प्रत्यक्षदर्शी न हो—यदि वे स्वतःस्फूर्त हों और समय व परिस्थिति से घनिष्ठ रूप से जुड़े हों, तो उन्हें उसी लेनदेन का हिस्सा मानकर ग्राह्य किया जा सकता है, और इस प्रकार वे अपवाद-आधारित ‘श्रुतकथन’ से स्वतंत्र रूप से भी स्वीकार्य होते हैं। न्यायिक रुख सुसंगत रूप से यह रहा है कि संबंध इतना निकट हो कि तथ्य मिलकर एक सतत कथा बनें, न कि मात्र ढीले-ढाले तरीके से संबंधित दिखें।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: केवल वही सटीक कृत्य जिसका निर्णय हो रहा है (जैसे घूंसा या पत्र) ही साक्ष्य के रूप में प्रयोज्य है।

    तथ्य: उस कृत्य से घनिष्ठ रूप से जुड़े तथ्य—जो ठीक पहले, दौरान, या तुरंत बाद घटित हुए हों, या उसी घटनाक्रम की कड़ी का भाग हों—इस प्रावधान के तहत प्रासंगिक साक्ष्य माने जा सकते हैं।

  • मिथक: तथ्यों का एक ही समय और स्थान पर होना अनिवार्य है तभी वे उसी लेनदेन का हिस्सा माने जाएंगे।

    तथ्य: यह प्रावधान स्पष्ट रूप से कहता है कि तथ्य ‘चाहे वे एक ही समय और स्थान पर हुए हों या भिन्न समयों और स्थानों पर,’ यदि वे मिलकर एक ही लेनदेन बनाते हों तो प्रासंगिक हैं।