Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 31
Relevancy of statement as to fact of public nature contained in certain Acts or
When the Court has to form an opinion as to the existence of any fact of a public nature, any statement of it, made in a recital contained in any Central Act or State Act or in a Central Government or State Government notification appearing in the respective Official Gazette or in any printed paper or in electronic or digital form purporting to be such Gazette, is a relevant fact.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
न्यायालयों को अक्सर सार्वजनिक महत्व के पृष्ठभूमि तथ्यों की स्थापना करनी होती है, जैसे कब किसी क्षेत्र को नगरपालिका घोषित किया गया, कब कोई युद्ध विधिवत समाप्त हुआ, या कब अकाल घोषित किया गया। ऐसे तथ्यों को हर बार प्रत्यक्षदर्शी गवाहों से सिद्ध कराना अव्यावहारिक होगा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 37 से चली आ रही यह व्यवस्था न्यायालयों को राजपत्र (Gazette) और विधायी रीसाईटल जैसे आधिकारिक अभिलेखों पर ऐसे तथ्यों के विश्वसनीय स्रोत के रूप में भरोसा करने देती है, यह मानते हुए कि सरकारी प्रकाशन औपचारिक, सत्यापित प्रक्रियाओं से बनते हैं।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती व्यवस्था (साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 37) के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार माना कि राजपत्र अधिसूचनाएँ और विधायी रीसाईटल प्रशासनिक इकाइयों के सृजन, आपातकाल की घोषणाएँ, या नियुक्तियों की सूचनाएँ जैसे सार्वजनिक तथ्यों के विश्वसनीय साक्ष्य हैं, क्योंकि वे वैधानिक दायित्व के तहत लोक प्राधिकरणों द्वारा तैयार किए जाते हैं। न्यायालयों ने स्पष्ट किया कि ये कथन ‘प्रासंगिक’ तो होते हैं, पर अपने आप निर्णायक प्रमाण नहीं बनते; विपक्षी पक्ष अभी भी मूल तथ्य को चुनौती दे सकता है, और न्यायालय यह परखता है कि वह रीसाईटल जिस प्रक्रिया से बना, उसके आधार पर उसकी विश्वसनीयता कितनी है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: राजपत्र अधिसूचना सदैव अंतिम होती है और उसे न्यायालय में कभी चुनौती नहीं दी जा सकती।
तथ्य: न्यायालय इसे केवल प्रासंगिक साक्ष्य की तरह मानते हैं; उसमें वर्णित तथ्य अब भी चुनौती दिए जा सकते हैं और अन्य साक्ष्यों के साथ तौला जा सकता है।
मिथक: यह नियम राजपत्र में उल्लिखित किसी भी तथ्य पर लागू होता है।
तथ्य: यह केवल ‘सार्वजनिक प्रकृति’ के तथ्यों पर लागू होता है, न कि ऐसे निजी या व्यक्तिगत तथ्यों पर जो संयोग से किसी सरकारी अधिसूचना में आ गए हों।