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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 169

No new trial for improper admission or rejection of evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम इसलिए है कि केवल तकनीकी चूक के कारण, जबकि अंतिम निर्णय वस्तुतः सही हो, मामलों को फिर से न खोला जाए या पलटा न जाए। लम्बी सुनवाइयों में कौन‑सा साक्ष्य लेना या न लेना है, इस बारे में छोटी‑मोटी त्रुटियाँ अक्सर हो जाती हैं। इस नियम के बिना हर तकनीकी गलती पुनर्विचार/पुनर्परीक्षण को मजबूर कर सकती, जिससे समय‑धन की बर्बादी, देरी और पक्षकारों व गवाहों पर कष्ट होता। यह उपबंध (मूलतः Indian Evidence Act, 1872 की Section 167, जिसे अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की Section 169 के रूप में पुनः अधिनियमित किया गया है) भारतीय साक्ष्य विधि के दीर्घकालिक सिद्धान्त को प्रतिध्वनित करता है कि सार रूप पर भारी होता है — निरापद भूल किसी अन्यथा ठोस और न्यायसंगत निर्णय को उलट न दे।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: साक्ष्य को स्वीकार या अस्वीकार करने में कोई भी गलती अपने‑आप पुनर्परीक्षण या निर्णय पलटने का कारण बनती है।

    तथ्य: न्यायालय तभी नया परीक्षण कराएंगे या निर्णय पलटेंगे जब गलती ने वास्तव में परिणाम को प्रभावित किया हो — निरापद त्रुटियों के लिए नहीं।

  • मिथक: यह धारा न्यायाधीशों को इस बात की छूट देती है कि वे किस साक्ष्य का प्रयोग किया जा सकता है, इस संबंध में सामान्य नियमों को नज़रअंदाज़ कर दें।

    तथ्य: यह साक्ष्य नियमों के उल्लंघन को माफ नहीं करती; यह केवल यह तय करती है कि ऐसी चूक कब इतनी गंभीर मानी जाए कि मामले के नतीजे को बदल दे।