Skip to content
सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 167

Using, as evidence, of document production of which was refused on

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम पक्षकारों को साक्ष्य के साथ खेल करने से रोकने के लिए है। यदि कोई पक्ष दस्तावेज़ देने से मना कर सके (जिससे विरोधी पक्ष को प्रतिलिपि या मौखिक बयान जैसे कमज़ोर गौण साक्ष्य पर भरोसा करना पड़े) और फिर बाद में मूल दस्तावेज़ दिखाकर उसी गौण साक्ष्य का खंडन करे या कोई रणनीतिक बढ़त ले, तो यह घोर अन्याय होगा। पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के Section 164 से आगे बढ़ाए गए इस प्रावधान का उद्देश्य यही सुनिश्चित करना है कि नोटिस के बावजूद दस्तावेज़ रोकने का चुनाव करने पर, व्यक्ति को उसी चुनाव के परिणाम भुगतने होंगे और वह उसी कार्यवाही में अवसरवादी तरीके से बाद में उस दस्तावेज़ का उपयोग नहीं कर सकता।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (Evidence Act, 1872 की Section 164) के अधीन, न्यायालयों ने लगातार माना कि यह नियम किसी पक्ष को अनुचित सामरिक बढ़त लेने से रोकने के लिए है — जैसे कि पहले उत्पादन से इनकार करने के बाद विरोधी पक्ष के गौण साक्ष्य पर मूल दस्तावेज़ से ‘घात’ करना, या मूल का उपयोग कर मुद्रांकन-अपर्याप्तता जैसी तकनीकी आपत्तियाँ उठाना। न्यायालयों ने नोटिस पर चुप्पी या इनकार को एक प्रकार के ‘चयन’ के रूप में माना है, जो उस मुकदमे की शेष अवधि तक उस पक्ष को बाध्य करता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कथन ग़लत है: कोई पक्ष दस्तावेज़ के उत्पादन से इंकार कर दे और फिर बाद में, यदि वह उसके पक्ष में हो, तो स्वतः ही उसे इस्तेमाल कर सके — ऐसा नहीं है।

    तथ्य: कानून कहता है कि विधिवत नोटिस के बाद उत्पादन से इंकार करने पर, बिना दूसरी पक्ष की सहमति या न्यायालय की अनुमति के, बाद में उस दस्तावेज़ का उपयोग करने का अधिकार खो जाता है।

  • मिथक: यह नियम दस्तावेज़ को हर मामले में हमेशा के लिए इस्तेमाल से निषिद्ध नहीं करता — ऐसा कहना ग़लत है।

    तथ्य: यह निषेध उसी पक्ष द्वारा उसी कार्यवाही में, बिना सहमति या न्यायालयादेश के, उस दस्तावेज़ के उपयोग पर लागू होता है; उपयुक्त परिस्थितियों में न्यायालय को उसे स्वीकार करने का विवेकाधिकार बना रहता है।