Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 165
Production of documents
(1) A witness summoned to produce a document shall, if it is in his possession or power, bring it to Court, notwithstanding any objection which there may be to its production or to its admissibility: Provided that the validity of any such objection shall be decided on by the Court.
(2) The Court, if it sees fit, may inspect the document, unless it refers to matters of State, or take other evidence to enable it to determine on its admissibility.
(3) If for such a purpose it is necessary to cause any document to be translated, the Court may, if it thinks fit, direct the translator to keep the contents secret, unless the document is to be given in evidence and, if the interpreter disobeys such direction, he shall be held to have committed an offence under section 198 of the Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023: Provided that no Court shall require any communication between the Ministers and the President of India to be produced before it.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान Indian Evidence Act, 1872 की धारा 162 से आया है, जिसे दो प्रतिस्पर्धी आवश्यकताओं के संतुलन हेतु तैयार किया गया था: प्रासंगिक दस्तावेज़ देखकर सत्य तक पहुँचने की अदालत की शक्ति, और शासन अथवा पक्षकार की कुछ संवेदनशील सामग्री (जैसे राज्य-गोपनीयता या उच्च-स्तरीय कार्यपालिका संचार) को गोपनीय रखने की वैध रुचि। यह सुनिश्चित करता है कि गवाह केवल इसलिए दस्तावेज़ लाने से इन्कार न कर दे कि वह उसे स्वयं अग्रोहणीय मानता है—यह निर्णय गवाह या किसी बाहरी प्राधिकारी का नहीं, न्यायाधीश का है। अनुवादक-गोपनीयता और मंत्री–राष्ट्रपति संचार संबंधी गोपनीयता के उपबंध न्यायिक परीक्षण की प्रक्रिया के दौरान संवेदनशील सामग्री के रिसाव से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पिछले प्रावधान (धारा 162, Evidence Act 1872) के अंतर्गत न्यायालयों ने माना कि किसी दस्तावेज़ पर विशेषाधिकार के दावा मान्य है या नहीं—इस पर अंतिम निर्णय कार्यपालिका का नहीं, न्यायपालिका का है; विशेषकर State of Punjab v. Sodhi Sukhdev Singh (1961) और बाद में S.P. Gupta v. Union of India (1981) (‘Judges Transfer case’) जैसे मामलों में, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने शासकीय संचार पर राज्य-विशेषाधिकार के दावों की समीक्षा की और सरकार के मात्र दावे के प्रति आँख मूँदकर झुकने के बजाय न्यायिक पुनरावलोकन पर बल दिया। Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 ने इसी संरचना को आगे बढ़ाया है और अपेक्षित है कि इन स्थापित सिद्धांतों के आलोक में ही इसका पाठ किया जाएगा, यद्यपि इसके अपने न्यायनिर्णयों का भंडार अभी नया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि गवाह दस्तावेज़ को व्यक्तिगत रूप से गोपनीय या अग्रोहणीय मानकर उसे अदालत लाने से इन्कार कर सकता है।
तथ्य: गवाह को दस्तावेज़ फिर भी लाना होगा; उसके उपयोग पर आपत्ति वैध है या नहीं—यह केवल न्यायाधीश तय करेंगे।
मिथक: यह कहना गलत है कि अदालतें सदैव किसी भी शासकीय दस्तावेज़ का निरीक्षण कर सकती हैं ताकि उसकी ग्राह्यता तय करें।
तथ्य: क़ानून विशेष रूप से राज्य संबंधी विषयों वाले दस्तावेज़ों को इस प्रावधान के अंतर्गत न्यायिक प्रत्यक्ष निरीक्षण से बाहर रखता है।
मिथक: यह कहना गलत है कि अनुवादक न्यायालय के लिए अनूदित दस्तावेज़ों की सामग्री के बारे में स्वतंत्र रूप से चर्चा कर सकते हैं।
तथ्य: यदि अदालत द्वारा सामग्री गोपनीय रखने का आदेश दिया गया हो, तो उस आदेश की अवहेलना Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के अधीन दंडनीय अपराध है।