Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 159
Questions tending to corroborate evidence of relevant fact, admissible
When a witness whom it is intended to corroborate gives evidence of any relevant fact, he may be questioned as to any other circumstances which he observed at or near to the time or place at which such relevant fact occurred, if the Court is of opinion that such circumstances, if proved, would corroborate the testimony of the witness as to the relevant fact which he testifies. Illustration. A, an accomplice, gives an account of a robbery in which he took part. He describes various incidents unconnected with the robbery which occurred on his way to and from the place where it was committed. Independent evidence of these facts may be given in order to corroborate his evidence as to the robbery itself.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
न्यायालयों को अक्सर यह अतिरिक्त भरोसा चाहिए होता है कि किसी अहम घटना के बारे में गवाह का बयान सटीक है, खासकर ऐसे गवाहों के मामले में जैसे सहयोगी-अभियुक्त, जिनकी गवाही स्वार्थपूर्ण या अविश्वसनीय हो सकती है। यह प्रावधान (मूलतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 157, जिसे अब भारतिया साक्ष्य अधिनियम, 2023 में पुनर्परिभाषित किया गया है) छोटे, सत्यापनीय किनारी विवरणों—जैसे घटना के रास्ते में गवाह ने क्या देखा—को सहायक प्रमाण के रूप में स्वीकार करता है, क्योंकि सच्चे गवाह सामान्यतः आकस्मिक तथ्यों को ठीक से याद रखते हैं, जबकि मनगढ़ंत कहानी गढ़ने वाले अक्सर ऐसा नहीं कर पाते।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने लम्बे समय से माना है कि इस प्रकार के प्रावधान के अंतर्गत अपेक्षित पुष्टिकरण सीधे अपराध से सम्बद्ध होना आवश्यक नहीं, बल्कि उसके आसपास की परिस्थितियों से होना पर्याप्त है—विशेषकर सहयोगी-अभियुक्त की गवाही के संदर्भ में, जिसे क़ानून सावधानी से देखता है। समान पूर्व प्रावधान (साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 157) की व्याख्या करने वाले निर्णयों ने रेखांकित किया कि ऐसे पुष्टिकारक विवरण उस सिद्धान्त को संतुष्ट करने में मदद करते हैं कि सहयोगी-अभियुक्त की गवाही बिना सहारे के भरोसेमंद नहीं मानी जानी चाहिए (पुराने अधिनियम की धारा 133 और धारा 114 के चित्रण (b) से जुड़ा सिद्धान्त), जो 2023 के क़ानून में भी समान रूप में परिलक्षित है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: पूछे जाने वाले अतिरिक्त विवरणों का अपराध या मुख्य तथ्य से सीधे-सीधे सम्बद्ध होना आवश्यक है।
तथ्य: उन्हें अपराध से सम्बद्ध होना ज़रूरी नहीं—बस इतना काफ़ी है कि वे बातें उसी समय या स्थान के आसपास गवाह द्वारा देखी गई हों और यह पुष्ट करें कि गवाह वास्तव में मौजूद था और सच बोल रहा है।
मिथक: यह प्रावधान स्वयं मुख्य तथ्य को सिद्ध कर देता है।
तथ्य: यह मुख्य तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध नहीं करता; यह केवल उस तथ्य के बारे में गवाह की विश्वसनीयता का समर्थन या पुष्टिकरण करता है, जैसा न्यायालय आकलन करे।