Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 157
Question by party to his own witness
(1) The Court may, in its discretion, permit the person who calls a witness to put any question to him which might be put in cross-examination by the adverse party.
(2) Nothing in this section shall disentitle the person so permitted under sub-section (1), to rely on any part of the evidence of such witness.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान ‘शत्रुतापूर्ण गवाह’ की समस्या को संबोधित करता है — वे लोग जो अदालत में आकर अपने पहले के दिए गए बयान से मुकर जाते हैं या बुलाने वाले पक्ष के साथ सहयोग करने से इनकार करते हैं। इस शक्ति के बिना, वकील अपने ही गवाह को चुनौती नहीं दे पाता, चाहे वह अचानक असहयोगी या टाल-मटोल करने लगे। यह नियम (पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 154 से आगे बढ़ाया गया) न्यायाधीशों को अधिक तीखे प्रश्नों की अनुमति देने का लचीलापन देता है ताकि गवाह के पलटने या सुविधाजनक भूल से सत्य पराजित न हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पिछले प्रावधान (Evidence Act, 1872 की धारा 154) के अंतर्गत, न्यायालयों ने स्पष्ट किया कि गवाह को ‘शत्रुतापूर्ण’ घोषित कर देने से उसका पूरा बयान स्वतः निरर्थक नहीं हो जाता — न्यायाधीश या जूरी उसके विश्वसनीय और पुष्ट हिस्सों को स्वीकार कर सकते हैं, जबकि वापस लिए गए या विरोधाभासी हिस्सों को अस्वीकार कर सकते हैं। न्यायालयों ने ऐसे प्रश्न पूछने की अनुमति देने के विवेक को व्यापक माना है, जिसका उपयोग तब होना चाहिए जब गवाह का आचरण या उत्तर संकेत दे कि वह बुलाने वाले पक्ष के लिए सच्चाई बोलने को इच्छुक नहीं है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: एक बार गवाह को शत्रुतापूर्ण घोषित कर दिया जाए, तो उसका पूरा बयान फेंक देना चाहिए।
तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि शत्रुतापूर्ण गवाह के बयान का वह हिस्सा जिस पर विश्वास किया जा सकता हो और जिसे अन्य साक्ष्य सहारा देते हों, आंशिक रूप से भरोसे लायक हो सकता है।
मिथक: कोई भी पक्ष जब चाहे अपने ही गवाह से जिरह कर सकता है।
तथ्य: यह स्वतः नहीं होता — इसके लिए अदालत के विवेक और अनुमति की आवश्यकता होती है, जो सामान्यतः तब दी जाती है जब गवाह विरोधी रुख अपना ले या टालमटोल करे।