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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 139

Number of witnesses

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह उपबंध भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (धारा 134) के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है, जिसकी जड़ें अंग्रेज़ी सामान्य विधि (English common law) में उस परिवर्तन से जुड़ी हैं जिसमें पुराने तय-गवाह-गिनती वाले तौर-तरीकों (जैसे कुछ ऐतिहासिक या धार्मिक विधि परंपराओं में दो-गवाह नियम) से दूरी बनाई गई। भारतीय साक्ष्य विधि संख्या के बजाय बयान की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर बल देती है, और यह मानकर चलती है कि न्यायाधीश सिर-गिनती से नहीं बल्कि गुण-दोष के आधार पर साक्ष्य का मूल्यांकन करेंगे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों, विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय, ने बार‑बार कहा है कि यदि किसी एक गवाह का बयान पूर्णतः भरोसेमंद, सुसंगत और विश्वास पैदा करने वाला हो तो केवल उसी पर दोषसिद्धि टिकी रह सकती है — इसे अक्सर इस सिद्धांत से संक्षेपित किया जाता है: ‘साक्ष्य को तौला जाता है, गिना नहीं जाता।’ अदालतों ने इसे बलात्कार के मामलों (जहां केवल पीड़िता का बयान आधार बना), प्रत्यक्षदर्शी हत्या मामलों, और अन्य स्थितियों में लागू किया है, बशर्ते न्यायाधीश जांच‑परख के बाद गवाह को विश्वसनीय पाएं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आपको अदालत में कुछ सिद्ध करने के लिए हमेशा कम से कम दो गवाहों की ज़रूरत होती है।

    तथ्य: भारतीय कानून में न्यूनतम गवाह संख्या की कोई शर्त नहीं है — किसी तथ्य को सिद्ध करने के लिए अदालत एक ही विश्वसनीय गवाह की गवाही पर निर्भर कर सकती है।

  • मिथक: ज़्यादा गवाह अपने‑आप किसी मुकदमे को हमेशा मज़बूत बना देते हैं।

    तथ्य: अदालतें गवाहियों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर ध्यान देती हैं, गवाहों की संख्या पर नहीं; कई अविश्वसनीय गवाह एक विश्वसनीय गवाह पर भारी नहीं पड़ते।