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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 138

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सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अपराधी साज़िशें और समूह-अपराध अक्सर ऐसे होते हैं जिनमें एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी वही लोग होते हैं जो ख़ुद शामिल थे। यदि क़ानून उनकी गवाही को पूरी तरह निषिद्ध कर दे, तो कई दोषी कभी सज़ा नहीं पाएँगे। पर सह-अपराधियों में झूठ बोलने, दोष टालने या लोक अभियोजक से समझौते कर अपने को बचाने की प्रवृत्ति का ख़तरा भी रहता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 133 से आई यह व्यवस्था इन चिंताओं का संतुलन करती है: यह सह-अपराधी की गवाही को विधिसंगत रूप से स्वीकार्य मानती है, जबकि न्यायालयों ने झूठी फंसावट से बचने के लिए पुष्टिकरण (corroboration) की व्यवहारिक परंपरा विकसित की है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, अंग्रेज़ी वाद R v. Baskerville से प्रेरणा लेते हुए, लम्बे समय से माना है कि यद्यपि सह-अपराधी की गवाही विधि अनुसार ग्राह्य है और उस पर आधारित दोषसिद्धि अवैध नहीं होती, फिर भी न्यायिक विवेक के नाते स्वतंत्र पुष्टिकरण के बिना दोषसिद्धि करना असुरक्षित है, जो अभियुक्त को अपराध से जोड़ दे। Sarwan Singh v. State of Punjab में सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि सह-अपराधी के साक्ष्य को अत्यधिक सावधानी से देखना चाहिए और आदर्शतः महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उसका पुष्टिकरण होना चाहिए, विशेषकर क्योंकि सह-अपराधी ‘अपराध में साझेदार’ होने के कारण दोष दूसरों पर डालने का स्वार्थ रख सकता है। यह न्यायालय-निर्मित ‘विवेक का नियम’ वैधानिक प्रावधान के साथ काम करता है, जो केवल इतना कहता है कि ऐसी दोषसिद्धि अवैध नहीं है; वह यह नहीं कहता कि पुष्टिकरण अनावश्यक है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ़ सह-अपराधी की गवाही अपने आप में क़ानूनी रूप से निरर्थक होती है और उससे कभी भी किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

    तथ्य: क़ानून कहता है कि सह-अपराधी की गवाही पर आधारित दोषसिद्धि अवैध नहीं है, यानी वह विधिक रूप से टिक सकती है — पर न्यायालय प्रायः सावधानी के तौर पर उस पर निर्भर होने से पहले पुष्टिकारक साक्ष्य तलाशते हैं।

  • मिथक: सह-अपराधी की गवाही के पुष्टिकरण की माँग इस धारा में लिखी एक सख़्त वैधानिक अनिवार्यता है।

    तथ्य: यह धारा स्वयं पुष्टिकरण को अनिवार्य नहीं करती; यह आवश्यकता सुरक्षित दोषसिद्धि सुनिश्चित करने के लिए न्यायालयों द्वारा विकसित किया गया विवेक-सिद्धांत है, न कि इस प्रावधान का कोई शब्दगत आदेश।