Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 124
Who may testify
All persons shall be competent to testify unless the Court considers that they are prevented from understanding the questions put to them, or from giving rational answers to those questions, by tender years, extreme old age, disease, whether of body or mind, or any other cause of the same kind. Explanation.—A person of unsound mind is not incompetent to testify, unless he is prevented by his unsoundness of mind from understanding the questions put to him and giving rational answers to them.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
पुराने साक्ष्य क़ानून (और उससे पहले के इंग्लिश कॉमन लॉ) में कभी‑कभी संपूर्ण श्रेणियों—जैसे बच्चे, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति, कुछ धार्मिक या सामाजिक समूह—को गवाही देने से पूरी तरह रोका जाता था। भारतीय क़ानून सुधारकों ने ऐसे समग्र निषेध को अस्वीकार किया और एक कार्यात्मक मानदंड अपनाया: महत्व इस बात का है कि व्यक्ति वास्तव में प्रश्न समझकर तर्कसंगत उत्तर दे सकता है या नहीं—न कि उसकी आयु, बीमारी या कोई लेबल। यह प्रावधान उसी सिद्धांत को आगे बढ़ाता है, जो लगभग शब्दशः पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 118 से लेकर Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में समाहित किया गया है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
इसी समान पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 118, Evidence Act 1872) के अंतर्गत, न्यायालयों ने एक व्यावहारिक कसौटी विकसित की: न्यायाधीश किसी बच्चे या अन्य संवेदनशील गवाह से प्रारम्भिक पूछताछ (वोआ डायर [voir dire]) करता है ताकि यह जाँचा जा सके कि वह सच बोलने के दायित्व को समझता है और तर्कसंगत उत्तर दे सकता है, न कि कोई न्यूनतम आयु तय की जाए। Rameshwar v. State of Rajasthan (1952) में,最高 न्यायालय ने माना कि यदि अदालत संतुष्ट हो कि बच्चा प्रश्न समझता है तो उसकी गवाही ग्राह्य है, यद्यपि सावधानीवश पुष्टिकरण देखना उपयुक्त है। इसी तरह, न्यायालयों ने ठहराया है कि मानसिक बीमारी या बौद्धिक अक्षमता वाला व्यक्ति स्वतः अयोग्य नहीं होता—योग्यता का आकलन प्रत्येक प्रकरण में गवाह की वास्तविक समझ और उत्तर देने की क्षमता के आधार पर किया जाता है, जो इस धारा के स्पष्टीकरण के अनुरूप है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: बच्चे कभी भी अदालत में गवाही नहीं दे सकते।
तथ्य: बच्चे गवाही दे सकते हैं यदि न्यायाधीश संतुष्ट हो कि वे प्रश्न समझते हैं और तार्किक उत्तर दे सकते हैं; कोई निश्चित न्यूनतम आयु नहीं है।
मिथक: मानसिक बीमारी वाला कोई भी व्यक्ति स्वतः गवाह बनने से वंचित है।
तथ्य: स्पष्टीकरण स्पष्ट करता है कि अस्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति भी गवाही दे सकता है, जब तक उसकी अवस्था वास्तव में उसे प्रश्न समझने और तर्कसंगत उत्तर देने से न रोकती हो।
मिथक: बहुत वृद्ध लोग भरोसेमंद गवाह नहीं हो सकते।
तथ्य: केवल वृद्धावस्था से गवाह अपात्र नहीं होता; अदालत व्यक्ति की वास्तविक समझने और उत्तर देने की क्षमता की जाँच करती है।