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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 123

Estoppel of acceptor of bill of exchange, bailee or licensee

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम अंग्रेज़ी सामान्य-विधि के ‘एस्टॉप्पल’ सिद्धान्त से आया, जिसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (धारा 117) के माध्यम से भारतीय विधि में समाहित किया गया, और अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (धारा 123) में पुनः व्यक्त किया गया है। विनिमय-पत्र, उधार-रक्षा (बेलमेंट) और लाइसेंस जैसे वाणिज्यिक लेन-देन भरोसे पर चलते हैं: जो व्यक्ति विनिमय-पत्र स्वीकार करता है, बतौर उधार-रक्षी (बेइली) माल लेता है, या बतौर लाइसेंसी परिसर में प्रवेश करता है, वह उस संबंध से लाभ उठाता है और परोक्ष रूप से दूसरे पक्ष की उस संबंध को बनाने की प्राधिकारिता को स्वीकार करता है। लाभ उठा लेने के बाद उसे उस प्राधिकारिता से मुकरने देना — ताकि दायित्व से बच सके — वाणिज्यिक निश्चितता और निष्पक्ष व्यवहार को कमजोर कर देगा।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: विनिमय-पत्र का स्वीकर्ता एक बार स्वीकार करने के बाद उसके बारे में कभी किसी बात पर विवाद नहीं कर सकता।

    तथ्य: व्याख्या 1 स्वीकर्ता को यह तर्क देने की अनुमति देती है कि विनिमय-पत्र वास्तव में उसी व्यक्ति द्वारा नहीं खींचा गया था जिसके नाम से वह प्रतीत होता है — यह खींचने वाले के अधिकार से इनकार करने से भिन्न प्रश्न है।

  • मिथक: एक उधार-रक्षी (बेइली) कभी यह नहीं पूछ सकता कि वस्तुओं का वास्तविक स्वामी कौन है।

    तथ्य: व्याख्या 2 उधार-रक्षी को यह अनुमति देती है कि यदि वह मूल उधारदाता (बेलर) के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को वस्तुएँ सौंपे, तो वह सिद्ध कर सके कि उस अन्य व्यक्ति का उन वस्तुओं पर, उधारदाता की तुलना में, बेहतर अधिकार था।