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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 116

Birth during marriage, conclusive proof of legitimacy

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 से आया है, जो अंग्रेज़ी सामान्य विधि के वैधता‑अनुमान पर आधारित था (‘pater est quem nuptiae demonstrant’ — पिता वही है जिसकी ओर विवाह संकेत करता है)। आनुवंशिक जाँच के अस्तित्व से पहले, मातृत्व तो स्पष्ट था पर पितृत्व नहीं, इसलिए अदालतों को बच्चे के वैधानिक पिता का व्यवहारिक और स्थिर निर्धारण चाहिए था। 280 दिन सामान्य मानवीय गर्भावधि की ऊपरी सीमा दर्शाते हैं। यह प्रावधान बच्चों को मात्र आशंका के आधार पर अवैध ठहराए जाने से बचाता है और दाम्पत्य स्थिरता को बढ़ावा देता है—क्योंकि इस अनुमान को खण्डित करना बहुत कठिन है: केवल पति‑पत्नी के ‘नो एक्सेस’ का प्रमाण ही पर्याप्त होता है, बेवफ़ाई के महज़ संदेह से नहीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने निरन्तर माना है कि यह अनुमान भारतीय क़ानून के सबसे प्रबल अनुमानों में से है। Kamti Devi v. Poshi Ram (2001) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वैधता‑अनुमान केवल ‘नो एक्सेस’ के मज़बूत और प्राबल्यकारी साक्ष्य से ही हटाया जा सकता है, महज़ संभावनाओं के संतुलन से नहीं। Goutam Kundu v. State of West Bengal (1993) में न्यायालय ने वैधता को चुनौती देने हेतु DNA जाँच के नियमित आदेश देने से सावधान किया, यह कहते हुए कि उन्हें ‘भटकती जाँच’ का औज़ार नहीं बनना चाहिए। परन्तु Nandlal Wasudeo Badwaik v. Lata Nandlal Badwaik (2014) और आगे Dipanwita Roy v. Ronobroto Roy (2015) में उच्चतम न्यायालय ने माना कि जहाँ DNA परीक्षण का परिणाम अपितृत्व को निर्णायक रूप से सिद्ध कर दे, वहाँ वह वैज्ञानिक साक्ष्य इस अनुमान पर वरीय होगा—क्योंकि सत्य और न्याय किसी विधिक कल्पना के आगे नहीं झुकते। नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) के तहत भी न्यायालय यही तर्क लागू करेंगे, क्योंकि धारा 116 मूल धारा 112 का ही बड़ा अंश दोहराती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक पति मात्र यह कह कर कि बच्चा उसका नहीं है, आसानी से पितृत्व से इनकार कर सकता है।

    तथ्य: अदालतों ने माना है कि इस अनुमान का खण्डन करना अत्यन्त कठिन है—पति को गर्भाधान की सम्भावित अवधि में पत्नी तक ‘नो एक्सेस’ का मज़बूत और आश्वस्तकारी प्रमाण दिखाना होगा; केवल संदेह या नकार पर्याप्त नहीं।

  • मिथक: DNA परीक्षण कभी भी इस अनुमान को चुनौती देने के लिए प्रयुक्त नहीं किए जा सकते।

    तथ्य: हालाँकि आरम्भ में अदालतें पारिवारिक गोपनीयता और बच्चों की स्थिति की रक्षा हेतु DNA परीक्षण के नियमित उपयोग से बचती थीं, पर बाद के उच्चतम न्यायालय के निर्णयों (उदा., Nandlal Wasudeo Badwaik) ने माना कि अपितृत्व का निर्णायक DNA प्रमाण इस वैधानिक अनुमान पर वरीय हो सकता है।

  • मिथक: यह प्रावधान वैधता से जुड़े हर संदर्भ में, उत्तराधिकार क़ानून सहित, सभी प्रश्नों का निर्णय करता है।

    तथ्य: यह अदालत में तथ्यात्मक/कानूनी प्रयोजनों के लिए वैधता का साक्ष्यगत अनुमान है; विशिष्ट व्यक्तिगत विधि या उत्तराधिकार क़ानूनों में अपने अतिरिक्त प्रावधान हो सकते हैं (सरलीकृत)।