Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 114
Proof of good faith in transactions where one party is in relation of active confidence
Where there is a question as to the good faith of a transaction between parties, one of whom stands to the other in a position of active confidence, the burden of proving the good faith of the transaction is on the party who is in a position of active confidence. Illustrations.
(a) The good faith of a sale by a client to an advocate is in question in a suit brought by the client. The burden of proving the good faith of the transaction is on the advocate.
(b) The good faith of a sale by a son just come of age to a father is in question in a suit brought by the son. The burden of proving the good faith of the transaction is on the father.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम भारतीय साक्ष्य क़ानून में लंबे समय से मान्य एक सिद्धांत से आता है (मूलतः Indian Evidence Act, 1872 की Section 111, जिसका पुनर्विधान अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की Section 114 के रूप में हुआ है)। सामान्यतः जो दावा करता है, उसे ही सिद्ध करना होता है। परन्तु न्यायालयों ने माना कि ‘सक्रिय विश्वास’ (active confidence) वाले संबंधों—जैसे अधिवक्ता-मुवक्किल, अभिभावक-अभिभाव्य, चिकित्सक-रोगी, या माता-पिता और कम-स्वतंत्र, आश्रित बालक—में एक पक्ष के पास इतना प्रभाव, भरोसा या नियंत्रण होता है कि सामान्य नियम लागू करना अनुचित पड़ सकता है। ऐसे प्रभाव में रहने वाला व्यक्ति शायद यह भी न समझ पाए कि उसके साथ कमतर सौदा हुआ, या उसके पास प्रमाण जुटाने के साधन या हिम्मत न हो। इसलिए कानून प्रमाण-भार को पलट देता है और शक्ति/विश्वास की स्थिति वाले व्यक्ति से अपेक्षा करता है कि वह सक्रिय रूप से दिखाए कि सौदा निष्पक्ष था, ताकि कमज़ोर पक्ष का शोषण न हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने लम्बे समय तक (पुरानी Section 111 के अधीन) इस सिद्धांत को सॉलिसिटर-मुवक्किल, न्यासी-लाभार्थी, आध्यात्मिक गुरु-शिष्य, तथा माता-पिता-शिशु जैसे संबंधों में लागू किया है, विशेषकर तब जब कोई पक्ष वृद्ध, निरक्षर, या अभी-अभी स्वतंत्र हुआ हो। न्यायालयों ने माना है कि ‘सक्रिय विश्वास’ हर भरोसेमंद संबंध से अपने-आप पैदा नहीं होता — यह दिखाना पड़ता है कि विशेष उसी लेन-देन में एक पक्ष ने सचमुच दूसरे पर भरोसा किया और उससे प्रभावित हुआ। ऐसा संबंध स्थापित हो जाने पर न्यायालय लगातार यह अपेक्षा करते हैं कि प्रभावी पक्ष अनुचित प्रभाव के अभाव, प्रतिफल (मूल्य) की पर्याप्तता, और पूर्ण प्रकटीकरण को सिद्ध करे; कमजोर पक्ष पर यह बोझ नहीं डाला जाता कि वह अपने साथ धोखा हुआ साबित करे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह नियम हर उस संबंध पर लागू होता है जहाँ लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, जैसे मित्र या पति-पत्नी।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल ‘सक्रिय विश्वास’ वाले संबंधों पर लागू होता है — जहाँ एक पक्ष को दूसरे के निर्णयों पर वास्तविक प्रभाव या नियंत्रण हो, जैसे अधिवक्ता-मुवक्किल, अभिभावक-अभिभाव्य, या पिता और ऐसा पुत्र जो अभी-अभी स्वतंत्र हुआ हो। समान दर्जे के लोगों के बीच साधारण आपसी भरोसा अपने-आप इस नियम को लागू नहीं करता।
मिथक: कमज़ोर पक्ष को फिर भी इतना तो दिखाना पड़ता है कि उसके साथ धोखा हुआ, तभी प्रमाण-भार बदलेगा।
तथ्य: एक बार जब ‘सक्रिय विश्वास’ वाला संबंध और वह लेन-देन स्थापित हो जाए, तो प्रमाण-भार पूर्णतः प्रभावी पक्ष पर शुद्ध निष्ठा (good faith) सिद्ध करने का आ जाता है — कमज़ोर पक्ष को पहले से अनुचितता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती।