Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 113
Burden of proof as to ownership
When the question is whether any person is owner of anything of which he is shown to be in possession, the burden of proving that he is not the owner is on the person who affirms that he is not the owner.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम साक्ष्य-कानून के एक पुराने और व्यावहारिक सिद्धांत को दर्शाता है: दैनिक जीवन में कब्जा अक्सर स्वामित्व का सबसे स्पष्ट संकेत होता है, क्योंकि अधिकतर लोग जो संपत्ति थामते या उपयोग करते हैं, वे वास्तव में उसके मालिक होते हैं। हर कब्जेदार से शून्य से स्वामित्व सिद्ध करवाना अव्यवहारिक होता, इसलिए कानून उस व्यक्ति पर भार-ए-सिद्धि डालता है जो उस स्वामित्व को चुनौती देता है। यही सिद्धांत भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 110 में था, और वही भारतिय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में आगे बढ़ाया गया है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के समतुल्य प्रावधान के अंतर्गत न्यायालयों ने माना है कि यह मान्यता तथ्य-संबंधी अनुमान है, निर्णायक प्रमाण नहीं — इसे बेहतर शीर्षक-संबंधी साक्ष्य, जैसे दस्तावेज़, पूर्व स्वामित्व के अभिलेख या गवाहों की गवाही से खंडित किया जा सकता है। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह मान्यता मुख्यतः चल अथवा अचल संपत्ति के उन विवादों में लागू होती है जहाँ वास्तविक भौतिक कब्जा सिद्ध हो, और यह स्वामित्व के स्पष्ट दस्तावेज़ी प्रमाण को निरस्त नहीं करती।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कब्जा हमेशा और हर हाल में कानूनी स्वामित्व ही होता है — चाहे कुछ भी हो।
तथ्य: कब्जा केवल स्वामित्व का एक अनुमान पैदा करता है — न्यायालयों ने माना है कि इसे दस्तावेज़ों या गवाहों जैसे अधिक प्रबल साक्ष्य से खंडित किया जा सकता है।
मिथक: यह नियम केवल भूमि या बड़ी संपत्ति पर ही लागू होता है।
तथ्य: यह उस ‘किसी भी’ वस्तु पर लागू होता है जो किसी व्यक्ति के कब्जे में हो, हालांकि न्यायालय संपत्ति के प्रकार और परिस्थितियों के आधार पर इस मान्यता की शक्ति का आकलन अलग-अलग करते हैं।