Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 111
Burden of proving that person is alive who has not been heard of for seven years
When the question is whether a man is alive or dead, and it is proved that he has not been heard of for seven years by those who would naturally have heard of him if he had been alive, the burden of proving that he is alive is shifted to the person who affirms it.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम अंग्रेज़ी कॉमन-लॉ की ‘मृत्यु की अनुमान’ सिद्धान्त से आया है, जिसे Indian Evidence Act, 1872 की धारा 108 में अपनाया गया था, और अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की धारा 111 के रूप में पुनः अधिरोपित है। यह एक व्यावहारिक समस्या सुलझाता है: संपत्ति, बीमा, पुनर्विवाह और उत्तराधिकार जैसे विवाद अक्सर इसलिए अटक जाते हैं क्योंकि लापता व्यक्ति की मृत्यु कोई निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं कर पाता। स्थायी अनिश्चितता छोड़ने के बजाय, क़ानून एक खण्डनीय अनुमान (rebuttable presumption) बनाता है—ऐसे लोगों से सात वर्षों तक स्वाभाविक तौर पर कोई खबर न मिलने पर—जो यह भार उस पक्ष पर डाल देता है जो ज़ोर देता है कि लापता व्यक्ति अब भी जीवित है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने, साक्ष्य अधिनियम की पूर्ववर्ती धारा 108 की व्याख्या करते हुए, लगातार स्पष्ट किया है कि यह प्रावधान केवल यह स्थापित करने में सहायक है कि सात वर्ष तक कोई खबर न मिलने के बाद कोई व्यक्ति ‘मृत’ माना जा सकता है—यह यह नहीं बताता कि उन वर्षों में ‘कब’ मृत्यु हुई। मृत्यु के सही समय का प्रश्न अलग है और उसे अन्य साक्ष्यों से स्वतंत्र रूप से सिद्ध करना पड़ता है, जैसा कि LIC of India v. Anuradha जैसे मामलों में रेखांकित किया गया है। न्यायालयों ने यह भी माना है कि सात वर्ष की गणना उस तिथि से होगी जब वाद में यह प्रश्न उत्पन्न होता है, और केवल समय बीत जाना पर्याप्त नहीं—रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य ऐसे लोगों के बीच वास्तविक, विश्वसनीय खोजबीन होना आवश्यक है जो साधारणतः उस लापता व्यक्ति से संपर्क में रहते।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा हमें यह ठीक-ठीक बताती है कि लापता व्यक्ति की मृत्यु कब हुई।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल सात वर्ष तक कोई खबर न मिलने पर व्यक्ति को मृत मानने का अनुमान देता है—यह मृत्यु की वास्तविक तिथि या समय तय नहीं करता; उन्हें अलग से सिद्ध करना पड़ता है।
मिथक: सात वर्षों की खामोशी अपने-आप उस व्यक्ति को क़ानूनी रूप से मृत घोषित कर देती है।
तथ्य: यह अनुमान केवल न्यायिक विवाद में सबूत के भार को स्थानांतरित करता है; यह अपने-आप किसी विशेष न्यायालय-कार्यवाही के बाहर मृत्यु प्रमाणपत्र या घोषणापत्र जारी नहीं कर देता।