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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 110

Burden of proving death of person known to have been alive within thirty years

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम जीवन और मृत्यु के अनुमान संबंधी इंग्लिश कॉमन लॉ के सिद्धांतों से आया, जिसे भारतीय साक्ष्य कानून में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (धारा 107) के माध्यम से अपनाया गया था, और अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में पुनर्व्यक्त किया गया है। इसका तर्क यह है कि नकारात्मक तथ्य (कि कोई मर चुका है) सिद्ध करना कठिन होता है, इसलिए न्यायालयों को किसी प्रारंभिक बिंदु की आवश्यकता रहती है। चूँकि हाल का जीवित होने का प्रमाण शक्तिशाली माना जाता है, कानून मृत्यु का दावा करने वाले पर प्रमाण का भार डालता है, ताकि उत्तराधिकार, बीमा, पुनर्विवाह आदि हेतु बिना ठोस प्रमाण नकली मृत्यु दावों को रोका जा सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय लगातार यह मानते आए हैं कि जीवन की निरंतरता का यह अनुमान केवल अंतिम बार जीवित पाए जाने से तीस वर्षों तक ही लागू होता है; उसके बाद, एक अन्य संबंधित प्रावधान के अंतर्गत न्यायालय सात वर्षों की अकारण अनुपस्थिति पर मृत्यु का अनुमान लगा सकते हैं। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह धारा ‘प्रमाण का भार’ (burden of proof) से संबंधित है, न कि अंतिम/निष्कर्षात्मक प्रमाण से — अर्थात यह अनुमान साक्ष्य से खंडित किया जा सकता है, और मृत्यु का दावा करने वाले पक्ष को ही साक्ष्य प्रस्तुत करना होगा।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि कोई व्यक्ति कई वर्षों के लिए ग़ायब हो जाए, तो न्यायालय स्वतः उसे मृत घोषित कर देते हैं।

    तथ्य: न्यायालय मृत्यु का प्रमाण तभी माँगते हैं जब व्यक्ति पिछले तीस वर्षों के भीतर जीवित पाया गया हो; और केवल सात या अधिक वर्षों की अकारण अनुपस्थिति के बाद (एक अलग प्रावधान के अंतर्गत) न्यायालय मृत्यु का अनुमान लगा सकते हैं, और तब भी यह स्वतः नहीं होता — साक्ष्य और परिस्थितियाँ महत्त्व रखती हैं।

  • मिथक: यह प्रावधान किसी की मृत्यु सिद्ध कर देता है।

    तथ्य: यह केवल कानूनी विवाद में यह तय करता है कि मृत्यु या जीवन सिद्ध करने का भार किस पर है — यह स्वयं यह स्थापित नहीं करता कि कोई व्यक्ति जीवित है या मृत।