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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 109

Burden of proving fact especially within knowledge

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सामान्यतः आरोप लगाने वाले पर साबित करने का भार होता है। पर कुछ तथ्य इतने व्यक्तिगत या छिपे होते हैं कि व्यवहारतः वही व्यक्ति उन्हें जान और सिद्ध कर सकता है—जैसे उसके पास टिकट था या लाइसेंस था, या उसकी खास मंशा क्या थी। पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 106 से चली आ रही यह नियमावली ऐसे विशिष्ट निजी तथ्यों का प्रमाणभार उस व्यक्ति पर स्थानांतरित करती है जिसके पास वह ज्ञान है, ताकि अभियोजन या दावे इस असंभव मांग पर न अटकें कि दूसरा पक्ष ही उसका नकारात्मक प्रमाण दे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, इसी पूर्ववर्ती प्रावधान (Evidence Act, 1872 की धारा 106) की व्याख्या करते हुए, लगातार माना है कि यह धारा उस सामान्य नियम का अपवाद है जिसके अनुसार अभियोजन को अपना मामला सिद्ध करना होता है, और यह दोष को संदेह से परे सिद्ध करने के समग्र भार को नहीं बदलती। न्यायालयों ने कहा है कि इसका दायरा संकीर्ण है—वे तथ्य जो किसी व्यक्ति के ही विशेष/एकांत ज्ञान में हों, जैसे टिकट या लाइसेंस का होना, या चोरी का माल मिलने पर उसका स्पष्टीकरण—न कि व्यापक प्रश्न जैसे अपराध सिद्ध हुआ या नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा यह नहीं कहती कि अभियुक्त को अपनी संपूर्ण निरपराधिता ही सिद्ध करनी होगी।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल उन खास तथ्यों का प्रमाणभार बदलती है जो किसी व्यक्ति के निजी ज्ञान में विशेष रूप से हों; अपराध को संदेह से परे सिद्ध करने का समग्र भार अब भी अभियोजन पर ही रहता है।

  • मिथक: इसे किसी भी ऐसे तथ्य को सिद्ध कराने के लिए नहीं इस्तेमाल किया जा सकता जो दूसरे पक्ष के लिए असुविधाजनक हो।

    तथ्य: यह केवल उन्हीं तथ्यों पर संकीर्ण रूप से लागू होती है जो सच में और विशेष रूप से किसी व्यक्ति के अपने ज्ञान में हों—जैसे मंशा या टिकट का होना—न कि सामान्य या साझा तथ्यों पर।