Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 104
Burden of proof
Whoever desires any Court to give judgment as to any legal right or liability dependent on the existence of facts which he asserts must prove that those facts exist, and when a person is bound to prove the existence of any fact, it is said that the burden of proof lies on that person.
Illustrations.
(a) A desires a Court to give judgment that B shall be punished for a crime which A says B has committed. A must prove that B has committed the crime.
(b) A desires a Court to give judgment that he is entitled to certain land in the possession of B, by reason of facts which he asserts, and which B denies, to be true. A must prove the existence of those facts.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान साक्ष्य क़ानून के एक बुनियादी सिद्धांत को संहिताबद्ध करता है जो Indian Evidence Act, 1872 (Section 101, जिसे अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में पुनर्व्यक्त किया गया है) से प्राप्त है। यह नियम न्यायिक कार्यवाही में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए है: जो भी दावा करता है, वह प्रमाण प्रस्तुत करे; दूसरे पक्ष से यह अपेक्षा न की जाए कि वह उसे गलत साबित करे। इससे व्यक्तियों को अप्रमाणित आरोपों के आधार पर दंडित होने या अधिकार खोने से संरक्षण मिलता है, और अदालतों में साक्ष्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी कैसे बाँटी जाए, इसका ढाँचा मिलता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने निरंतर माना है कि प्रमाणभार उसी पर होता है जो अपने प्रकरण के लिए आवश्यक किसी तथ्य का प्रतिपादन करता है, और मात्र इस कारण से कि विरोधी पक्ष उस दावे का खंडन करता है, यह भार स्थानांतरित नहीं होता। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह निवेदन (प्लीडिंग) और साक्ष्य का आधारभूत नियम है, और आपराधिक मामलों में यही निर्दोषता के अनुमान का आधार है—जहाँ अभियोजन को दोष ‘उचित संदेह से परे’ सिद्ध करना होता है, न कि अभियुक्त को अपनी निर्दोषता सिद्ध करनी पड़ती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि अभियुक्त या प्रतिवादी को हमेशा अपनी निर्दोषता या अपना बचाव सिद्ध करना होता है।
तथ्य: सामान्यतः प्रमाणभार उसी पर होता है जो दावा करता है (जैसे आपराधिक मामले में अभियोजन, या दीवानी मामले में वादी), न कि उस पर जो उसे नकार रहा है; हालाँकि कुछ विशेष अपवाद अन्य क़ानूनों में कुछ प्रकार के बचावों के लिए मिलते हैं।
मिथक: ‘प्रमाणभार’ का अर्थ यह नहीं है कि आपको किसी बात को पूर्ण निश्चितता के साथ सिद्ध करना है।
तथ्य: प्रमाण का मानदंड भिन्न होता है—आपराधिक मामलों में ‘उचित संदेह से परे’ सिद्ध करना पड़ता है, जबकि दीवानी मामलों में ‘संभावनाओं के पलड़े के संतुलन’ पर सिद्धि पर्याप्त होती है। Section 104 केवल यह तय करता है कि प्रमाणभार किस पर है, न कि प्रमाण का सटीक मानदंड क्या होगा।