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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 103

Saving of provisions of Indian Succession Act relating to wills

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

साक्ष्य-क़ानून (जैसे पहले का Indian Evidence Act, 1872 और अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) में दस्‍तावेज़ों की व्याख्या के सामान्य नियम होते हैं—जैसे कि किसी दस्‍तावेज़ के अर्थ को समझाने के लिए किन मौखिक या लिखित साक्ष्यों का सहारा लिया जा सकता है। पर वसीयतें दस्‍तावेज़ों की एक विशेष श्रेणी हैं, जिन पर अपने विस्तृत क़ानून—Indian Succession Act, 1925—के विशिष्ट नियम लागू होते हैं, जो वसीयतनामा बनाने वाले की मंशा (testamentary intent) की व्याख्या का ढांचा देते हैं। यह संरक्षण प्रावधान सुनिश्चित करता है कि दस्‍तावेज़-व्‍याख्या पर साक्ष्य-क़ानून के सामान्य नियम अनजाने में उत्तराधिकार अधिनियम के वसीयत-व्‍याख्या संबंधी विशेष नियमों को न तो रद्द करें और न उनसे टकराएँ। इससे दोनों क़ानूनों के बीच सामंजस्य बना रहता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने ऐतिहासिक रूप से पुराने Indian Evidence Act, 1872 के समान शब्दों वाले प्रावधान (Section 102) को एक सादा ‘संरक्षण प्रावधान’ माना है—अर्थात जहाँ भी सामान्य साक्ष्य-व्‍याख्या के नियम और वसीयत की व्याख्या से जुड़े उत्तराधिकार क़ानून के सिद्धांत एक-दूसरे से ओवरलैप होते दिखें, वहाँ वसीयत संबंधी सिद्धांत प्रधान रहेंगे। Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में पुनर्प्रवर्तन होने पर भी इस समझ में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि साक्ष्य-क़ानून इस अध्याय के सामान्य दस्‍तावेज़-व्‍याख्या नियमों के अनुसार वसीयत की व्याख्या करने देता है।

    तथ्य: विशेष रूप से वसीयतों के मामले में, व्याख्या पर Indian Succession Act, 1925 का नियंत्रण रहता है; यह अध्याय उसे निरस्त या अधिरोहित नहीं करता।

  • मिथक: यह अनुभाग वसीयतें पढ़ने के लिए कोई नए नियम नहीं जोड़ता।

    तथ्य: यह नए नियम नहीं बनाता—यह तो केवल उत्तराधिकार अधिनियम के विद्यमान नियमों को इस अध्याय से प्रभावित होने से बचाता है।