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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 100

Evidence as to application of language to one of two sets of facts, to neither of which the

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह उपबंध दस्‍तावेज़ों में पाई जाने वाली एक विशिष्ट प्रकार की अस्पष्टता को संबोधित करता है—जब वर्णन किसी एक चीज़ से साफ़-साफ़ मेल खाने के बजाय दो वास्तविक चीज़ों से आधा-अधूरा मेल खाता है। ऐसे मामले उस स्थिति से अलग हैं जहाँ वर्णन किसी एक चीज़ पर पूर्णतः फिट बैठता हो, या किसी पर भी नहीं। ‘दो चीज़ों पर आंशिक मिलान’ मंशा को लेकर वास्तविक अनिश्चितता पैदा करता है। यह नियम एक दीर्घकालिक साक्ष्य सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है (जो Indian Evidence Act, 1872 से चला आ रहा है) कि जब लिखित शब्द इसी प्रकार से संदिग्ध हों, तो न्यायालय को न तो अटकल लगानी चाहिए और न ही लेन-देन को शून्य ठहराना चाहिए—बल्कि पक्षकारों की वास्तविक मंशा जानने के लिए आस-पास के तथ्य और परिस्थितियाँ देखनी चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि कोई विवरण किसी भी चीज़ से ठीक-ठीक न मिले, तो समझौता या दस्‍तावेज़ अपने-आप अवैध हो जाता है।

    तथ्य: न्यायालय दस्‍तावेज़ को अपने-आप शून्य नहीं करते। इस उपबंध के तहत, जब विवरण दो वस्तुओं से आंशिक रूप से मेल खाता है, तो मंशा स्पष्ट करने के लिए साक्ष्य लिया जा सकता है, ताकि वास्तविक मंशा स्थापित हो जाने पर लेन-देन को प्रभावी बनाया जा सके।

  • मिथक: यह उपबंध न्यायालयों को यह अनुमान लगाने या अटकलबाज़ी करने की छूट देता है कि किसी पक्ष का ‘शायद’ क्या आशय रहा होगा।

    तथ्य: यह उपबंध अटकल की अनुमति नहीं देता; यह विशेष रूप से बहिर्ज साक्ष्य (तथ्य, आचरण, संचार) को स्वीकार करने देता है ताकि वास्तविक मंशा तय हो सके, न कि कल्पनात्मक निष्कर्ष।