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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 6

Classes of Criminal Courts

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत की आपराधिक न्याय-व्यवस्था को न्यायालयों की स्पष्ट पदानुक्रम की आवश्यकता है ताकि विभिन्न गम्भीरता के मामले उपयुक्त स्तर के न्यायाधीश के पास जाएँ, और प्रशासनिक कार्य (जैसे जन-व्यवस्था बनाए रखना) न्यायिक मुक़दमेबाज़ी से अलग रहें। यह ढाँचा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 से चली आ रही व्यवस्था को नयी ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023’ (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) में आगे बढ़ाता है, जिसमें कार्यपालिक दण्डाधिकारियों को न्यायिक दण्डाधिकारियों से पृथक रखा गया है ताकि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त (separation of powers) को बनाए रखा जा सके, जो भारतीय संवैधानिक विन्यास में रेखांकित है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने ऐतिहासिक रूप से दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के समकक्ष प्रावधान—धारा 6—को प्रत्येक राज्य में आपराधिक न्यायालयों की एक पूर्ण एवं अनिवार्य पदानुक्रम के रूप में पढ़ा है, जो उच्च न्यायालयों और विशेष अधिकरणों से पृथक है। CrPC की व्याख्या करने वाले निर्णयों ने रेखांकित किया है कि कार्यपालिक दण्डाधिकारी प्रशासनिक और क़ानून-व्यवस्था के कार्य करते हैं, न्यायिक निर्णय नहीं देते, जिससे मजिस्टीरियल स्तर पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धान्त को बल मिलता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कथन ग़लत है: कार्यपालिक दण्डाधिकारी किसी व्यक्ति के अपराधी होने-न-होने का निर्णय नहीं कर सकते।

    तथ्य: कार्यपालिक दण्डाधिकारी प्रशासनिक और जन-व्यवस्था के विषय सँभालते हैं; वे आपराधिक मुक़दमे नहीं चलाते और न ही दोष तय करते—यह कार्य न्यायिक दण्डाधिकारियों और सेशन न्यायालय का है।

  • मिथक: यह अनुभाग भारत के सभी न्यायालयों, जिनमें उच्च न्यायालय भी शामिल हैं, पर लागू होता है।

    तथ्य: यह अनुभाग विशेष रूप से उच्च न्यायालयों और अन्य विशेष क़ानूनों के तहत निर्मित न्यायालयों को बाहर रखता है, और इस संहिता के अधीन आपराधिक न्यायालयों के पदानुक्रम पर ही केन्द्रित रहता है।