Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 56
Health and safety of arrested person
It shall be the duty of the person having the custody of an accused to take reasonable care of the health and safety of the accused.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह उपबंध भारतीय दंड प्रक्रिया में लंबे समय से चले आ रहे सिद्धांत को आगे बढ़ाता है (जिसका पूर्व उल्लेख दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 55A में था) कि हिरासत का अर्थ यह नहीं है कि राज्य व्यक्ति के कुशल‑क्षेम की उपेक्षा कर सकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत दी गई उन गांरटियों को प्रतिबिंबित करता है, जिन्हें न्यायालयों ने गरिमा के साथ जीने के अधिकार—यहां तक कि गिरफ़्तारी के दौरान भी—के रूप में व्याख्यायित किया है। यह नियम अभिरक्षकों—पुलिसकर्मियों, जेल प्रशासन या किसी भी अभियुक्त को हिरासत में रखने वाले—पर सकारात्मक दायित्व डालता है कि वे क्षति को रोकें, चिकित्सकीय सहायता सुनिश्चित करें, और हिरासत में उत्पीड़न या लापरवाही से बचें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने, विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय ने D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) जैसे मामलों में, माना है कि हिरासती हिंसा और उपेक्षा अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, और गिरफ़्तार व्यक्तियों के साथ व्यवहार के लिए दिशा‑निर्देश निर्धारित किए हैं, जिनमें चिकित्सकीय परीक्षण और मानवीय व्यवहार शामिल हैं। यद्यपि BNSS की धारा 56 स्वयं नई है और अभी न्यायालयों द्वारा व्याख्यायित नहीं हुई, यह उन देखभाल‑कर्तव्यों का संहिताकरण करती है जिन्हें न्यायपालिका ने हिरासत में रखे व्यक्तियों के प्रति अधिकारियों पर मान्यता दी है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: गिरफ़्तारी के बाद व्यक्ति के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी अब पुलिस की नहीं रहती।
तथ्य: क़ानून स्पष्ट रूप से यह ठहराता है कि हिरासत में रहते हुए अभियुक्त के स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी अभिरक्षकों पर है।
मिथक: यह नियम केवल जेलों पर लागू होता है, पुलिस लॉक‑अप पर नहीं।
तथ्य: यह दायित्व ‘अभियुक्त की हिरासत में रखने वाले व्यक्ति’ पर लागू होता है, जिसमें पुलिसकर्मी या अन्य प्राधिकारी भी आ सकते हैं, केवल जेल‑कर्मचारी ही नहीं।