Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 57
Person arrested to be taken before Magistrate or officer in charge of police station
A police officer making an arrest without warrant shall, without unnecessary delay and subject to the provisions herein contained as to bail, take or send the person arrested before a Magistrate having jurisdiction in the case, or before the officer in charge of a police station.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम लंबे समय से प्रचलित दंड प्रक्रिया सुरक्षा उपायों (पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 57) से आया है, जिनका उद्देश्य पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल या गुप्त रूप से निरुद्ध रखने से रोकना है। यह संविधान के अनुच्छेद 22(2) में निहित उस गारंटी को प्रतिबिंबित करता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को शीघ्र मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए, जिससे गिरफ्तारी पर न्यायिक निगरानी बनी रहे और मनमानी निरुद्धीकरण या हिरासत में दुरुपयोग पर अंकुश लगे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने, विशेषकर Joginder Kumar v. State of Uttar Pradesh (1994) और D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) में, ‘बिना अनावश्यक विलंब’ की शर्त को उस संवैधानिक निर्देश के साथ पढ़ा है जिसके अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को चौबीस घंटे के भीतर (यात्रा का समय छोड़कर) मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना आवश्यक है। इन निर्णयों में मजिस्ट्रेट के समक्ष त्वरित पेशी को अवैध निरुद्धीकरण के विरुद्ध एक मूल सुरक्षा माना गया है, और किसी भी बिना स्पष्टीकरण के हुई देरी से निरुद्धीकरण अवैध ठहर सकता है तथा अधिकारियों पर दायित्व आ सकता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: पुलिस किसी गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने से पहले जितनी देर चाहें उतनी देर तक हिरासत में रख सकती है।
तथ्य: कानून पुलिस से ‘बिना अनावश्यक विलंब’ करने की अपेक्षा करता है, और अदालतों ने इसे उस संवैधानिक नियम के साथ पढ़ा है कि व्यक्ति को गिरफ़्तारी के चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।
मिथक: यह प्रावधान केवल गंभीर अपराधों पर लागू होता है।
तथ्य: यह बिना वारंट की गई किसी भी गिरफ़्तारी पर लागू होता है, चाहे अपराध कितना भी गंभीर या साधारण क्यों न हो।