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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 55

Procedure when police officer deputes subordinate to arrest without warrant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान एक पुराने सुरक्षा उपाय की निरंतरता है (मूलतः दंड प्रक्रिया संहिता, 1898/1973 की धारा 55), जिसका उद्देश्य पुलिस पदानुक्रम में ऊपर से नीचे केवल अस्पष्ट या मौखिक निर्देशों के आधार पर की जाने वाली गिरफ्तारियों को रोकना है। व्यक्ति और कारण को निर्दिष्ट करते हुए लिखित आदेश की मांग करके, यह अभिलेखीय निशान बनाता है और गिरफ्तार व्यक्ति को यह जानने का अधिकार देता है कि किसी अधीनस्थ अधिकारी—जो व्यक्तिगत जानकारी के बजाय किसी अन्य के अधिकार पर कार्य कर रहा है—द्वारा उसे क्यों रोका जा रहा है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

इस प्रावधान की अकेले अलग से व्याख्या करने वाला कोई प्रमुख रिपोर्टेड निर्णय विशेष रूप से नहीं है, परन्तु न्यायालयों ने D.K. Basu v. State of West Bengal तथा Joginder Kumar v. State of U.P. जैसे मामलों में बार‑बार जोर दिया है कि गिरफ्तारियाँ जवाबदेह, अभिलेखित और गिरफ्तार व्यक्ति को सूचित की जानी चाहिए। गिरफ़्तारी प्रक्रिया में पारदर्शिता के ये व्यापक सुरक्षा सिद्धांत यहाँ के लिखित-आदेश की आवश्यकता के अनुरूप हैं, यद्यपि इस विशेष धारा पर स्वतंत्र रूप से उल्लेखनीय न्यायनिर्णय नहीं बना है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी पुलिस अधिकारी केवल मौखिक रूप से कहकर किसी अन्य अधिकारी से किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है।

    तथ्य: कानून यह अपेक्षा करता है कि जब कोई वरिष्ठ अधिकारी अपनी अनुपस्थिति में किसी अधीनस्थ को बिना वारंट गिरफ्तारी के लिए नियुक्त करता है, तो जिस व्यक्ति को और किस अपराध के लिए गिरफ्तार करना है, यह बताता हुआ लिखित आदेश दिया जाए।

  • मिथक: यह धारा ही पुलिस के लिए बिना वारंट गिरफ्तारी करने का एकमात्र तरीका है।

    तथ्य: उपधारा (2) स्पष्ट करती है कि धारा 35 के अंतर्गत बिना वारंट गिरफ्तारी की सामान्य शक्ति इस प्रक्रिया से स्वतंत्र रूप से लागू रहती है।