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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 52

Examination of person accused of rape by medical practitioner

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (धारा 53A से उद्भूत, जिसे 2012 दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले के बाद 2013 के आपराधिक विधि संशोधन के उपरान्त दंप्रसं में शामिल किया गया) यौन अपराध मामलों में फॉरेंसिक साक्ष्य-संग्रह को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से लाया गया था। अभियुक्त की चिकित्सकीय जाँच—चोटों, डीएनए सामग्री और अन्य शारीरिक संकेतकों की तलाश—पीड़िता/उत्तरजीवी के कथन का समर्थन या परीक्षण कर सकती है, जिससे केवल गवाही पर निर्भरता घटती है और दोषसिद्धि की शुद्धता बढ़ती है। यह प्रक्रिया को मानकीकृत भी करती है ताकि एकत्र साक्ष्य वैज्ञानिक रूप से अभिलेखित हों और न्यायालय में ग्राह्य रहें।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः बलात्कार मामलों में अभियुक्त की चिकित्सकीय जाँच को संविधान के अनुरूप माना है, इसे अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत निषिद्ध बयानात्मक बाध्यता से अलग ठहराते हुए। Selvi v. State of Karnataka (2010) में, सर्वोच्च न्यायालय ने शारीरिक/दैहिक साक्ष्य (अनुमेय) और बयान देने के लिए बाध्य करना (अननुमेय) के बीच रेखा खींची, और इसी सिद्धांत को ऐसी जाँचों पर लागू किया गया है। State of U.P. v. Chhotey Lal तथा Krishan Kumar Malik v. State of Haryana जैसे निर्णयों ने रेखांकित किया है कि समय पर की गई चिकित्सकीय एवं डीएनए जाँच अभियोजन के मामले को सुदृढ़ करती है, और ऐसी जाँच न करना या उसका समुचित अभिलेखन न होना अभियोजन के साक्ष्य-मूल्य को कमजोर कर सकता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा पुलिस को स्वयं अभियुक्त का शारीरिक परीक्षण करने का अधिकार देती है।

    तथ्य: केवल पंजीकृत चिकित्सकीय प्रैक्टिशनर ही परीक्षण कर सकता/सकती है, पुलिस नहीं; यद्यपि पुलिस इसके लिए अनुरोध कर सकती है और सद्भाव से सहायता कर सकती है।

  • मिथक: चिकित्सक परीक्षण के दौरान मनमाना/असीमित बल प्रयोग कर सकता/सकती है।

    तथ्य: कानून केवल ‘युक्तिसंगत आवश्यक’ बल की अनुमति देता है, असीमित बल की नहीं।

  • मिथक: यह प्रावधान बलात्कार पीड़िता/उत्तरजीवी की जाँच के बारे में है।

    तथ्य: यह धारा विशेष रूप से अभियुक्त के परीक्षण से संबंधित है; पीड़िता/उत्तरजीवी का परीक्षण अलग प्रावधान में विनियमित है।