Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 475
Restriction on powers of remission or commutation in certain cases
Notwithstanding anything contained in section 473, where a sentence of imprisonment for life is imposed on conviction of a person for an offence for which death is one of the punishments provided by law, or where a sentence of death imposed on a person has been commuted under section 474 into one of imprisonment for life, such person shall not be released from prison unless he had served at least fourteen years of imprisonment.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
इस नियम के बिना, ‘आजीवन कारावास’ की सजा को, सैद्धांतिक रूप से, सामान्य दंड-रिमिशन के माध्यम से दोषसिद्धि के तुरंत बाद ही बहुत कम किया जा सकता था, जिससे अति-गंभीर श्रेणी के अपराधों के लिए दंड की कठोरता कमज़ोर पड़ जाती। यह धारा ऐसे सबसे गंभीर मामलों में रिहाई पर किसी भी रिमिशन पर विचार से पहले वास्तविक अभिरक्षा का एक सख्त न्यूनतम समय-सीमा तय करती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने Union of India v. V. Sriharan @ Murugan (2016) में स्पष्ट किया कि यह 14 वर्ष का न्यूनतम (पहले दंप्रसं की धारा 433A के तहत) केवल उस दहलीज़ को दर्शाता है जिसके बाद ही रिमिशन का आवेदन विचारार्थ आ सकता है—यह 14 वर्ष बाद स्वत: रिहाई का कोई अधिकार नहीं बनाता, और सरकारें उपयुक्त, गम्भीर मामलों में वास्तविक कारावास की इससे भी लंबी न्यूनतम शर्तें वैध रूप से लगा सकती हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: चौदह वर्ष पूरे होते ही, इस श्रेणी में आजीवन कारावास पाए व्यक्ति को स्वतः रिहा कर दिया जाता है।
तथ्य: 14 वर्ष केवल वह न्यूनतम है जिसके बाद रिमिशन पर विचार शुरू हो सकता है—वास्तविक रिहाई स्वतः नहीं होती और अब भी सरकार के आगे के निर्णय पर निर्भर करती है।