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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 46

No unnecessary restraint

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम पुराने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 49 में मौजूद सुरक्षा को आगे बढ़ाता है। यह मानता है कि गिरफ्तारी अपने आप में स्वतंत्रता पर एक गंभीर पाबंदी है, और आवश्यकता से अधिक बल, हथकड़ियाँ या बेड़ियाँ लगाना कानून के अभिप्राय से परे अनावश्यक अपमान और शारीरिक क्षति जोड़ देता है। यह विचार संवैधानिक गरिमा के वादे (अनुच्छेद 21) में निहित है — पुलिस की गिरफ्तारी की शक्ति अपमानित करने या यातना देने का लाइसेंस नहीं है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

सर्वोच्च न्यायालय ने बार‑बार कहा है कि नियमित रूप से हथकड़ी लगाना गैरकानूनी और असंवैधानिक है। Prem Shankar Shukla v. Delhi Administration (1980) में, न्यायालय ने माना कि हथकड़ी तभी लगाई जानी चाहिए जब भागने या हिंसा का वास्तविक जोखिम हो, और तब भी गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी को कारण लिखित रूप में दर्ज करने चाहिए। Citizens for Democracy v. State of Assam (1995) में, न्यायालय ने दोहराया कि विचाराधीन कैदियों और बंदियों को सामान्य तौर पर हथकड़ी या बेड़ियाँ नहीं लगाई जा सकतीं, और बिना विशेष न्यायालयीन अनुमति व ठोस औचित्य के ऐसा करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। इन फैसलों ने इस धारा (पूर्व धारा 49 CrPC) को अभिरक्षा में भी गरिमा के संवैधानिक अधिकार की वैधानिक अभिव्यक्ति के रूप में माना है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को सामान्य प्रक्रिया के रूप में हथकड़ी लगा सकती है।

    तथ्य: अदालतों ने कहा है कि हथकड़ी तभी उचित है जब भागने या हिंसा का वास्तविक जोखिम हो; इसे नियमित रूप से या अपमान के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

  • मिथक: यह धारा एक बार गिरफ्तार होने के बाद पुलिस को असीमित बल प्रयोग की अनुमति देती है।

    तथ्य: इसके विपरीत — यह बंधन को केवल आवश्यक सीमा तक सीमित करती है और गिरफ्तार व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करती है।