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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 37

Designated police officer

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान मनमाने गिरफ्तारी, हिरासत में दुर्व्यवहार, और परिवारों द्वारा अपने निरुद्ध परिजनों का पता न लगा पाने जैसी पुरानी चिंताओं के उत्तर में लाया गया है। यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित है — विशेषकर D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) — जिसमें पुलिस को गिरफ्तारी का दृश्य व पारदर्शी रिकॉर्ड रखने के लिए कहा गया था, ताकि लोगों को गुप्त रूप से न रखा जा सके और परिवार या वकील उन्हें ढूंढ सकें। Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (जिसने CrPC का स्थान लिया) इन न्यायिक सुरक्षा उपायों को राज्य सरकारों पर वैधानिक दायित्व में बदल देती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश बनाए जिनके तहत पुलिस को गिरफ्तारी के अभिलेख रखना, परिवारों को सूचित करना, और यह जानकारी सुलभ कराना आवश्यक ठहराया गया — आंशिक रूप से हिरासत में मौतों और जबरन गुमशुदगी को रोकने के लिए। धारा 37 बड़े पैमाने पर इस न्यायिक आदेश को बाध्यकारी वैधानिक कानून में रूपांतरित करती है, यद्यपि सहायक के ज्ञान-सीमा तक न्यायालयों ने इस विशिष्ट प्रावधान की व्याख्या नहीं की थी।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस यदि चाहे तो किसी गिरफ्तारी को पूरी तरह गुप्त रख सकती है।

    तथ्य: धारा 37 के तहत गिरफ्तारी का विवरण दर्ज करना और उसे सार्वजनिक रूप से (डिजिटल सहित) प्रदर्शित करना अनिवार्य है; इसलिए गुप्त निरोध कानूनन अस्वीकार्य है।

  • मिथक: केवल वरिष्ठ अधिकारी ही गिरफ्तारी अभिलेखों को संभालते हैं।

    तथ्य: कानून यह स्पष्ट करता है कि इतनी जिम्मेदारी के लिए सहायक उपनिरीक्षक (Assistant Sub-Inspector) जितने कनिष्ठ रैंक के अधिकारी को भी नामित किया जा सकता है, जो इस जानकारी के संधारण और प्रदर्शन का दायित्व संभाले।