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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 29

Powers of Judges and Magistrates exercisable by their successors-in office

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारत में न्यायिक अधिकारी प्रायः स्थानांतरित होते हैं, पदोन्नत होते हैं या सेवानिवृत्त हो जाते हैं, जबकि मामले लंबित रहते हैं। ऐसे नियम के बिना, प्रत्येक परिवर्तन के साथ मुक़दमे को फिर से शून्य से शुरू करना पड़ सकता है, जिससे वर्षों का परिश्रम व्यर्थ होगा और वादकारियों को विलंब व कठिनाई झेलनी पड़ेगी। यह प्रावधान (पूर्व दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की योजना को आगे बढ़ाते हुए) उत्तराधिकारी अधिकारी को पूर्वाधिकारी के स्थान पर कार्य करने की अनुमति देकर न्यायिक कार्यवाही की निरंतरता सुनिश्चित करता है, और संदिग्ध परिस्थितियों में ‘उत्तराधिकारी’ कौन माना जाएगा, इस पर उत्पन्न विवाद सुलझाने की व्यवस्था भी देता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (CrPC, 1973 की धारा 10) के अधीन न्यायालयों ने लगातार यह माना कि उत्तराधिकारी दंडाधिकारी या न्यायाधीश बिना मुक़दमे को पुनः आरंभ किए कार्यवाही जारी रख सकता है—जैसे आगे का साक्ष्य दर्ज करना या अंतिम आदेश देना—बशर्ते प्रक्रियात्मक संरक्षण (जैसे वास्तविक आवश्यकता हो तो गवाहों को पुनः बुलाना) का पालन हो। न्यायालयों ने इसे प्रशासनिक एवं न्यायिक निरंतरता का नियम माना है, न कि पहले से निष्पन्न मामलों को पुनर्जीवित करने वाला प्रावधान।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि न्यायाधीश या दंडाधिकारी बदल जाए, तो पूरा मुक़दमा फिर से शुरू करना अनिवार्य है।

    तथ्य: क़ानून उत्तराधिकारी अधिकारी को मौजूदा अभिलेख का उपयोग करते हुए उसी मामले को आगे बढ़ाने की अनुमति देता है, ताकि कार्यवाही को शून्य से दोबारा शुरू करने की ज़रूरत न पड़े।

  • मिथक: जो भी अधिकारी बाद में पदस्थ हो जाए, वह अपने आप ‘उत्तराधिकारी’ होने का दावा नहीं कर सकता।

    तथ्य: यदि सचमुच यह संदेह हो कि उत्तराधिकारी कौन है, तो केवल सत्र न्यायाधीश (न्यायाधीशों के लिए) या मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी/ज़िला मजिस्ट्रेट (दंडाधिकारियों के लिए) ही लिखित आदेश देकर इसे आधिकारिक रूप से तय कर सकते हैं।