Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 227
Issue of process
(1) If in the opinion of a Magistrate taking cognizance of an offence there is sufficient ground for proceeding, and the case appears to be—
(a) a summons-case, he shall issue summons to the accused for his attendance; or
(b) a warrant-case, he may issue a warrant, or, if he thinks fit, a summons, for causing the accused to be brought or to appear at a certain time before such Magistrate or (if he has no jurisdiction himself) some other Magistrate having jurisdiction: Provided that summons or warrants may also be issued through electronic means.
(2) No summons or warrant shall be issued against the accused under sub-section (1) until a list of the prosecution witnesses has been filed.
(3) In a proceeding instituted upon a complaint made in writing, every summons or warrant issued under sub-section (1) shall be accompanied by a copy of such complaint.
(4) When by any law for the time being in force any process-fees or other fees are payable, no process shall be issued until the fees are paid and, if such fees are not paid within a reasonable time, the Magistrate may dismiss the complaint.
(5) Nothing in this section shall be deemed to affect the provisions of section 90.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने सिद्धान्त (पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 204) को आगे बढ़ाता है कि जब अदालत यह पाती है कि किसी आपराधिक शिकायत या पुलिस प्रतिवेदन में कार्यवाही आगे बढ़ाने लायक पर्याप्त सामग्री है, तो अभियुक्त को औपचारिक रूप से सूचित किया जाना चाहिए ताकि वह उत्तर दे सके। समन-प्रकरण (कम गम्भीर अपराध) और वारंट-प्रकरण (गम्भीर अपराध) के बीच किया गया अंतरुपात सिद्धान्त को प्रतिबिम्बित करता है — हल्के अपराधों में केवल उपस्थित होने का साधारण नोटिस, जबकि गम्भीर अपराधों में गिरफ्तारी के जरिए उपस्थिति सुनिश्चित करने का औचित्य हो सकता है। BNSS ने पुराने कानून में दो नयी बातें जोड़ीं: समन/वारंट के इलेक्ट्रॉनिक जारीकरण की स्पष्ट मान्यता (अदालती प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण) और यह अनिवार्य शर्त कि प्रक्रिया जारी करने से पहले अभियोजन की गवाह-सूची दाखिल हो, ताकि देरी घटे और मामला प्रारम्भ से ही सुनवाई योग्य स्थिति में रहे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 204 CrPC) के अधीन, न्यायालयों ने बार-बार कहा कि प्रक्रिया जारी करना एक गम्भीर न्यायिक कृत्य है, जिसमें वास्तविक मनोयोग से विचार अपेक्षित है — मजिस्ट्रेट को, भले संक्षेप में ही सही, यह दिखाना चाहिए कि आगे बढ़ने के पर्याप्त आधार क्यों हैं, और मात्र शिकायत दाखिल हो जाने से यांत्रिक रूप से समन जारी नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि एक बार संज्ञान ले लिया गया और प्रक्रिया जारी हो गई, तो सामान्यतः वही मजिस्ट्रेट उसे वापस नहीं लेगा/लेगी, सिवाय संकीर्ण परिस्थितियों के; यद्यपि उच्च न्यायालयों के पास ऐसी कार्यवाही रद्द करने की शक्ति रहती है यदि प्रक्रिया का जारी होना स्पष्टतः अनुचित रहा हो। ये सिद्धान्त BNSS की समकक्ष धारा 227 की व्याख्या का मार्गदर्शन करते रहेंगे, यद्यपि धारा 227 BNSS पर विशिष्ट न्यायिक निर्णय अभी विकसित हो रहे हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: वारंट जारी होना हमेशा ही बिना किसी प्रारम्भिक अदालत-हाज़िरी के तुरन्त गिरफ्तारी का अर्थ देता है।
तथ्य: वारंट-प्रकरणों में भी, मजिस्ट्रेट परिस्थितियों और मामले की गम्भीरता देखते हुए, वारंट के स्थान पर केवल समन जारी करने का विवेकाधिकार रखता/रखती है।
मिथक: मजिस्ट्रेट शिकायत दायर होते ही कभी भी समन या वारंट भेज सकता/सकती है।
तथ्य: इस धारा के तहत, जब तक अभियोजन अपनी गवाह-सूची दाखिल नहीं करता और जहां लागू हो, आवश्यक फीस अदा नहीं हो जाती, तब तक प्रक्रिया जारी नहीं की जा सकती।