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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 201

Place of trial in case of certain offences

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

डकैती, अपहरण और चोरी जैसे अपराध प्रायः अनेक स्थानों में फैल जाते हैं—अपराध एक जगह होता है, पर अभियुक्त, पीड़ित या चोरी का सामान कहीं और मिल सकता है। पूर्व दंड प्रक्रिया कानून (Code of Criminal Procedure, 1973) ने इस व्यावहारिक समस्या को मान्यता दी थी और विशेष क्षेत्राधिकार नियम बनाए थे ताकि जहाँ साक्ष्य, पीड़ित या संपत्ति वास्तव में हो, वहाँ के निकटतम पुलिस व न्यायालय मामले को संभाल सकें, न कि हर बात को मूल घटना-स्थल पर ही लौटाना पड़े। नई संहिता में यह धारा उसी तर्क को आगे बढ़ाती है, लचीलेपन को सुनिश्चित करती है और उन क्षेत्राधिकार-रिक्तियों को रोकती है जिनका दुरुपयोग अपराधी भागकर या चोरी का माल इधर-उधर कर के कर सकते थे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती समान भाषा वाली धारा (CrPC, 1973 में अपहरण संबंधी Section 182 तथा संबंधित धाराएँ) के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार माना है कि ऐसा क्षेत्राधिकार अनन्य नहीं होता—यह केवल अतिरिक्त न्यायालयों को वैध मंच के रूप में जोड़ता है, साथ ही सामान्य नियम बना रहता है कि जहाँ अपराध हुआ उस न्यायालय को क्षेत्राधिकार है। न्यायाधीशों ने रेखांकित किया है कि ये प्रावधान अधिकार-सक्षम (enabling) हैं, सीमित करने वाले नहीं, और इनका उद्देश्य अपराधियों को भौगोलिक तकनीकीताओं के सहारे न्याय से बच निकलने से रोकना है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: एक अपराध का ट्रायल केवल और केवल उसी स्थान पर हो सकता है जहाँ वह घटित हुआ।

    तथ्य: यह धारा दिखाती है कि चोरी, अपहरण या न्यासभंग जैसे अपराधों में, अन्य सम्बद्ध स्थानों (जैसे जहाँ चोरी का माल या अभियुक्त मिले) के न्यायालयों को भी क्षेत्राधिकार मिल सकता है।

  • मिथक: यदि पुलिस किसी नए शहर में किसी व्यक्ति को चोरी के सामान के साथ पकड़ ले, तो उस शहर का अपराध से कोई कानूनी संबंध नहीं होता।

    तथ्य: कानून विशेष रूप से यह अनुमति देता है कि जहाँ चोरी का सामान पाया जाए उसी शहर में मुकदमा चल सकता है, भले ही मूल अपराध कहीं और हुआ हो।