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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 168

Police to prevent cognizable offences

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारत के औपनिवेशिक काल के दण्ड प्रक्रिया संहिताओं में निहित नियम (नवीनतम रूप से CrPC, 1973 की धारा 149) को आगे बढ़ाता है, जो पुलिसिंग क़ानून के एक दीर्घकालिक सिद्धांत को दर्शाता है: अपराध की रोकथाम उतना ही पुलिस का कर्तव्य है जितना कि उसके घटित होने के बाद जाँच करना। विचार यह है कि पुलिस केवल हानि के बाद पहुँचकर अभिलेख तैयार करने वाली प्रतिक्रियात्मक इकाई न बने, बल्कि जब वह किसी गंभीर अपराध को होता हुआ देखे या समुचित रूप से अनुमान करे, तो सार्वजनिक सुरक्षा की रक्षा के लिए नुकसान से पहले सक्रिय हस्तक्षेप करे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः इस धारा और इसकी पूर्ववर्ती धारा (CrPC धारा 149) को पुलिस पर एक निवारक कर्तव्य के रूप में पढ़ा है, जो अपराध घटित होने के बाद की अन्वेषणात्मक ड्यूटी से अलग है। न्यायिक निर्णयों ने रेखांकित किया है कि यह निवारक शक्ति युक्तिसंगत ढंग से प्रयुक्त होनी चाहिए और यह अति बल प्रयोग या मनमाने कृत्य की अनुमति नहीं देती; इसे असंवैधानिक गिरफ़्तारी, निरुद्धि या बल प्रयोग के विरुद्ध संवैधानिक संरक्षणों के साथ मिलाकर पढ़ना आवश्यक है। इस विशिष्ट धारा से अनन्य रूप से जुड़ा कोई एकल ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं है; इसलिए इसकी व्याख्या मुख्यतः पुलिस शक्तियों और कर्तव्यों पर सामान्य न्याय-निरूपण से विकसित हुई है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस केवल तब ही कार्रवाई कर सकती है जब अपराध हो चुका हो।

    तथ्य: यह प्रावधान विशेष रूप से पुलिस को संज्ञेय अपराध को घटित होने से पहले ही रोकने हेतु हस्तक्षेप करने की शक्ति देता है और ऐसा करने का दायित्व भी लगाता है।

  • मिथक: इससे पुलिस को किसी भी अपराध को रोकने के लिए असीमित बल प्रयोग की शक्ति मिल जाती है।

    तथ्य: यह प्रावधान केवल अधिकारी की सामर्थ्य के अनुसार कार्य करने का कर्तव्य स्थापित करता है; यह बल प्रयोग या गिरफ़्तारी की प्रक्रियाओं पर लागू अन्य कानूनी सीमाओं को निरस्त नहीं करता।