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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 109

Power to impound document, etc., produced

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सुनवाई के दौरान अदालतों को अक्सर प्रस्तुत दस्तावेज़ों या भौतिक वस्तुओं (जैसे अनुबंध, पत्र, हथियार, या अन्य साक्ष्य) की जाँच करनी पड़ती है। कभी-कभी अदालत को संदेह हो सकता है कि वस्तु जाली है, छेड़छाड़ हुई है, या भावी कार्यवाही के लिए अत्यंत आवश्यक है, या यह आशंका हो सकती है कि लौटाने पर वह नष्ट या दुरुपयोग हो जाएगी। ऐसे में यह शक्ति अदालत को साक्ष्य सुरक्षित रखने, न्याय सुनिश्चित करने और छेड़छाड़ रोकने हेतु उन वस्तुओं को अपने पास रखने की अनुमति देती है। यह शक्ति उपनिवेशकालीन दण्ड प्रक्रिया संहिता से भारतीय प्रक्रमिक क़ानून में विद्यमान है और नयी संहिता में भी उसी रूप में जारी है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता के समकक्ष प्रावधान (Section 104 CrPC) के अधीन न्यायालयों ने कहा है कि इम्पाउंड करना एक विवेकाधीन शक्ति है, जिसका प्रयोग न्यायसंगत ढंग से होना चाहिए—मनमाने ढंग से नहीं। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि इम्पाउंड ठोस कारणों पर आधारित होना चाहिए, जैसे जालसाज़ी का संदेह, आगे जाँच की आवश्यकता, या लंबित/भावी वादों से प्रासंगिकता—सिर्फ सुविधा के लिए नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अदालत को सभी दस्तावेज़ों या वस्तुओं को सुनवाई में उपयोग होते ही तुरंत लौटाना अनिवार्य है।

    तथ्य: यदि अदालत को विश्वास हो कि न्याय के हित में ऐसा करना उचित है—जैसे साक्ष्य की सुरक्षा या आगे की जाँच आवश्यक है—तो उसके पास ऐसे मदों को (‘इम्पाउंड’ कर) अपने पास रखने का विवेकाधिकार है।

  • मिथक: इम्पाउंड करने का अर्थ यह है कि दस्तावेज़ को जाली या अवैध मान लिया गया है।

    तथ्य: इम्पाउंड करना केवल इतना दर्शाता है कि अदालत वह मद सुरक्षा या परीक्षण हेतु अपने पास रख रही है—यह अपने आप में उस दस्तावेज़ की प्रामाणिकता या विधिक वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं है।