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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 82

Marrying again during lifetime of husband or wife

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता की पुरानी धारा 494/495 की निरंतरता है, जिसकी जड़ें 19वीं सदी के औपनिवेशिक विवाह कानून में हैं, जहाँ भारत के अधिकांश निजी विधि व्यवस्थाओं में एक-पत्नी/एक-पति प्रथा को कानूनी मानक माना गया था (धार्मिक निजी विधि के अपवादों सहित, जैसे मुस्लिम विधि में बहुपत्नी/बहुपति विवाह की अनुमति)। इसका उद्देश्य विवाह की पवित्रता की रक्षा करना, नये जीवनसाथी के साथ छल को रोकना, और उस spouse को कानूनी उपाय देना है जिसके साथी ने चुपके से पुनर्विवाह कर लिया।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती आई.पी.सी. धारा 494/495 (समान शब्दों) के अंतर्गत न्यायालयों ने माना कि द्विविवाह के दोषसिद्धि हेतु पहली वैध शादी का सिद्ध होना अनिवार्य है — मात्र सह-निवास या अप्रमाणित विवाह-रीति पर्याप्त नहीं है (उदाहरणतः लागू निजी विधि के आवश्यक संस्कारों का प्रमाण आवश्यक बताया गया, जैसा कि Kanwal Ram v. State of Himachal Pradesh जैसे निर्णयों में देखा गया)। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया कि उपधारा (2) के अंतर्गत ‘गोपन’ की कठोरता तब ही लागू होगी जब सिद्ध हो कि नये जीवनसाथी को पूर्व विवाह की जानकारी वास्तविक रूप से नहीं थी।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि पहली शादी दुखदायी या अनौपचारिक थी, तो पुनर्विवाह करना वास्तव में अपराध नहीं है।

    तथ्य: कानून केवल यह देखता है कि पहली शादी विधिवत वैध थी और अभी भी विद्यमान है — दुखदायी होना या अनौपचारिकता आपराधिक देयता को समाप्त नहीं करता।

  • मिथक: पति/पत्नी के कुछ वर्षों तक गायब रहने का इंतज़ार कर लेना अपने-आप बिना किसी शर्त के पुनर्विवाह की अनुमति दे देता है।

    तथ्य: ‘7 वर्ष लापता spouse’ का अपवाद तभी लागू होता है जब पुनर्विवाह करने वाला व्यक्ति विवाह से पहले ईमानदारी से यह स्थिति नये जीवनसाथी को बता दे; इसे छिपाना अपराध बना रहता है।