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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 81

Cohabitation caused by man deceitfully inducing belief of lawful marriage

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (पहले भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 493, जिसे अब भरतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 के रूप में पुनर्निरीक्षित किया गया है) का उद्देश्य स्त्रियों को उनके वैवाहिक दर्जे के बारे में होने वाले छल से बचाना है—जैसे दिखावटी शादी की रस्म, जाली विवाह प्रमाणपत्र, या पहले से विद्यमान विवाह को छुपाना। कानून मानता है कि सहवास या अंतरंगता के लिए स्त्री की सहमति वास्तविक या सूचित सहमति नहीं मानी जाएगी, यदि वह इस झूठे विश्वास पर आधारित हो कि विवाह पहले ही हो चुका है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः इस प्रावधान को विवाह के अस्तित्व के बारे में किए गए छल—जैसे ढोंगी रस्म या छिपी हुई द्विविवाहिता—पर केंद्रित माना है, न कि भविष्य में विवाह करने के केवल अपूर्ण रह गए वादे पर। इसी से यह बलात्कार/यौन अपराध से सम्बद्ध उन मामलों से अलग ठहरता है, जहाँ स्त्री जानती है कि अभी विवाह नहीं हुआ है, पर भविष्य में विवाह होने के वादे से वह सहमत होती है। न्यायालयों ने मुख्य भेद यह माना है: ‘पहले से विवाह हो चुका है’ ऐसा छल (यहाँ आवृत) बनाम ‘भविष्य में विवाह का झूठा वादा’ (अन्यत्र निपटाया जाता है)।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कानून हर उस पुरुष पर लागू होता है जो विवाह का वादा करके बाद में उसे तोड़ देता है।

    तथ्य: अदालतों ने इस प्रावधान को भविष्य में विवाह के झूठे वादे वाले मामलों से अलग ठहराया है; यह धारा खासकर तब लागू होती है जब स्त्री को यह धोखे से विश्वास दिलाया जाए कि विवाह पहले से विधिवत् हो चुका है।

  • मिथक: इस अपराध के लागू होने के लिए स्त्री को यह सिद्ध करना आवश्यक है कि उसे शारीरिक चोट पहुँची थी।

    तथ्य: यह अपराध वैवाहिक दर्जे के बारे में किए गए छल और उसी झूठे विश्वास के आधार पर हुए सहवास या यौन संबंध पर केंद्रित है, न कि किसी अलग से हुई शारीरिक क्षति पर।