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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 8

Amount of fine, liability in default of payment of fine, etc

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जुर्माना दंड के सबसे पुराने और सरल रूपों में से है, पर यह तभी निरोधक बनता है जब न चुकाने पर वास्तविक परिणाम हो। औपनिवेशिक काल के दंड क़ानून (Indian Penal Code, 1860) ने ‘डिफ़ॉल्ट सज़ा’ की व्यवस्था दी ताकि केवल जुर्माना अनदेखा कर देने वाले के सामने अदालत बेबस न हो। समय के साथ सुरक्षा उपाय जोड़े गए — डिफ़ॉल्ट कारावास की सीमाएँ, आंशिक भुगतान पर आनुपातिक रिहाई, और राज्य की वसूली पर समय-सीमाएँ — ताकि जुर्माना खासकर ग़रीबों के लिए अनिश्चित या अत्यधिक कारावास का पिछला दरवाज़ा न बन जाए। Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 ने इसी ढाँचे को आगे बढ़ाया है (पुराने IPC की धारा 64 का काफ़ी हद तक प्रतिबिंब) और ‘सामुदायिक सेवा’ को वैकल्पिक सज़ा मानकर ढाँचे को आधुनिक किया है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय लंबे समय से मानते आए हैं कि डिफ़ॉल्ट कारावास कोई वैकल्पिक दंड नहीं, बल्कि जुर्माना वसूल कराने का दवाबकारी साधन है, और डिफ़ॉल्ट अवधि तय करते समय अदालत को यांत्रिक ढंग से नहीं, सोच-समझकर निर्णय करना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने बार-बार मजिस्ट्रेटों को आगाह किया है कि असहाय निर्धनों पर कठोर या असंगत डिफ़ॉल्ट सज़ाएँ न थोपें, और कभी-कभी किस्तों में भुगतान के निर्देश दिए हैं। IPC की समकक्ष धारा (धारा 64) की व्याख्या करने वाले निर्णयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि डिफ़ॉल्ट सज़ाएँ जोड़कर कानून द्वारा तय बाहरी सीमाओं से अधिक नहीं की जा सकतीं, और आंशिक भुगतान से जेल की अवधि अनिवार्यतः आनुपातिक रूप से घटती है, जैसा कि स्वयं इस अनुभाग के उदाहरण में दिखाया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: डिफ़ॉल्ट कारावास एक वैकल्पिक सज़ा है जिसे अपराधी जुर्माना भरने की जगह सरलता से चुन सकता है।

    तथ्य: यह निःशुल्क विकल्प नहीं, बल्कि न-चुकाने का परिणाम है — न्यायालय और बाद की व्याख्याएँ इसे दबावकारी, न कि स्थानापन्न, दंड मानती हैं।

  • मिथक: एक बार डिफ़ॉल्ट कारावास तय हो जाए, बाद में आंशिक भुगतान करने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

    तथ्य: कानून स्पष्ट रूप से आंशिक भुगतान पर जेल की अवधि को आनुपातिक रूप से घटाने का निर्देश देता है, जैसा कि उदाहरण में दर्शाया गया है।

  • मिथक: यदि जुर्माना बकाया रह जाए तो अपराधी की मृत्यु पर वह स्वतः समाप्त हो जाता है।

    तथ्य: अनुभाग कहता है कि मृतक की वैधानिक रूप से देय संपत्ति/तरक़्क़ी से भी जुर्माना वसूल किया जा सकता है।