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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 56

Abetment of offence punishable with imprisonment

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक विधि सामान्यतः हुए नुकसान को दंडित करती है, पर उकसावे (अभियोजन-पूर्व सहभागिता) से जुड़ी धाराएँ इसलिए हैं कि अपराध के लिए उकसाना या षड्यंत्र करना अपने आप में खतरनाक है—यह आपराधिक अभिप्राय दर्शाता है और आसानी से वास्तविक हानि में बदल सकता है। यह प्रावधान (पुराने Indian Penal Code की धारा 116 से विधिवत आगे बढ़ाया गया) उस रिक्ति को भरता है: जब नियोजित अपराध घटित नहीं भी हुआ हो, तब भी उसे करवाने की चेष्टा करने वाला व्यक्ति पूरी तरह दंड से नहीं बचे। लोक सेवकों के लिए दंड-वृद्धि उस नीति को प्रतिध्वनित करती है कि जिन पर अपराध रोकने का भरोसा है—जैसे पुलिस अधिकारी—यदि वही उन अपराधों में उकसावे का काम करें जिन्हें रोकना उनका कर्तव्य है, तो वे विशेष विश्वासघात करते हैं और इसलिए कठोर परिणाम के पात्र हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

समान पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 116 IPC) के अंतर्गत न्यायालयों ने लगातार माना है कि उकसावा एक स्वतंत्र, अपूर्ण (inchoate) अपराध के रूप में दंडनीय है—अभियोजन को यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं कि मूल अपराध हुआ; पर्याप्त है कि उकसावा (भड़काना, षड्यंत्र, या जानबूझकर सहायता) हुआ और उसके परिणामस्वरूप अपराध घटित नहीं हुआ। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि लोक सेवकों के लिए बढ़ा हुआ दंड तभी लागू होता है जब उस विशिष्ट अपराध को रोकना उनके दायित्व के रूप में स्पष्ट रूप से निहित हो, केवल सार्वजनिक पद धारण करने मात्र से नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि अपराध वास्तव में घटित नहीं होता, तो किसी को दंड नहीं दिया जा सकता।

    तथ्य: कानून स्पष्ट रूप से उकसावे को दंडित करता है, भले ही नियोजित अपराध कभी किया न जाए—बशर्ते यह सिद्ध हो कि उकसावा (भड़काना, सहायता या षड्यंत्र) हुआ है।

  • मिथक: लोक सेवकों को उनके पद के कारण विशेष नरमी मिलती है।

    तथ्य: यहाँ उलटा है—यदि लोक सेवक का कर्तव्य उस अपराध को रोकना था, तो उसे उकसाने पर कानून कम नहीं, बल्कि अधिक कठोर दंड लगाता है।

  • मिथक: यह धारा सभी उकसावे के मामलों पर लागू होती है।

    तथ्य: यह केवल तब लागू होती है जब अपराध घटित न हुआ हो और संहिता में कोई अन्य विशिष्ट प्रावधान पहले से उसी उकसावे को दंडित न करता हो।