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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 57

Abetting commission of offence by public or by more than ten persons

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान, भारतीय दंड संहिता की धारा 117 से लिया गया, उन परिस्थितियों को संबोधित करता है जहाँ सामूहिक उकसावे से व्यापक हिंसा या अपराध भड़क सकता है — जैसे किसी भीड़ या धार्मिक/समुदाय समूह को भड़काना। ऐतिहासिक रूप से, औपनिवेशिक काल के विधि-निर्माताओं ने माना कि बड़े जनसमूह को उकसाना, व्यक्तिगत उत्सादन से भिन्न और अधिक खतरनाक है, क्योंकि इससे दंगे, साम्प्रदायिक हिंसा या संगठित अपराध भड़क सकते हैं; इसलिए, भले ही उकसाया गया अपराध घटित न हो, इसके लिए अलग और कड़ा दंड आवश्यक है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः माना है कि यह धारा तब भी लागू होती है जब समूह द्वारा वास्तव में कोई अपराध न किया गया हो — दस से अधिक लोगों (या आम जनता) को उकसाने या प्रोत्साहित करने का कृत्य अपने आप में दंडनीय है। संबंधित आईपीसी प्रावधान के न्यायिक व्याख्या में बल दिया गया कि उकसावा ऐसे समूह की ओर लक्षित हो जो दस से अधिक लोगों का हो या व्यापक जनता की ओर, जिससे यह साधारण उत्सादन (जो एक या कुछ व्यक्तियों के उत्सादन पर लागू होता है) से अलग ठहरता है। अदालतों ने जनसामूहिक कार्रवाई के आह्वान वाले सार्वजनिक पोस्टर, भाषण या पैम्फलेट जैसे उदाहरणों को भी इस धारा के अंतर्गत क्लासिक मिसालों के रूप में देखा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आपको तभी सज़ा दी जा सकती है जब भीड़ वही अपराध कर दे जिसे आपने प्रोत्साहित किया था।

    तथ्य: जैसे ही आप दस से अधिक लोगों या आम जनता को उकसाते या प्रोत्साहित करते हैं, अपराध पूर्ण हो जाता है — इसके लिए वास्तविक रूप से अपराध का घटित होना आवश्यक नहीं है।

  • मिथक: यह धारा केवल राजनीतिक या धार्मिक भीड़ों पर ही लागू होती है।

    तथ्य: यह किसी भी ऐसी स्थिति पर लागू होती है जहाँ दस से अधिक लोगों, या सामान्य रूप से जनता, को किसी भी अपराध के लिए भड़काया जाता है — संदर्भ चाहे जो भी हो।