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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 40

Commencement and continuance of right of private defence of body

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम भारतीय आपराधिक कानून में निजी रक्षा के सामान्य सिद्धांत (पहले Indian Penal Code के अंतर्गत, अब Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में पुनर्प्रस्तुत) से आता है। कानून मानता है कि यदि लोगों को तब तक इंतज़ार करना पड़े जब तक उन्हें वास्तव में चोट न लग जाए, तो आत्मरक्षा अक्सर निष्फल हो जाएगी — तब तक बहुत देर हो सकती है। इसलिए विधि-निर्माताओं ने अधिकार को ‘उचित आशंका’ के बिंदु पर उत्पन्न माना, ताकि लोग खुद को बचाने का न्यायसंगत अवसर पा सकें, और साथ ही इसे इस तरह सीमित किया कि खतरा टल जाने के बाद यह बदले की अनुमति न बन जाए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, पूर्ववर्ती Indian Penal Code की समान धारा (Section 102) की व्याख्या करते हुए, लगातार कहा है कि खतरे की आशंका उचित और ईमानदारी से महसूस की गई होनी चाहिए, मात्र काल्पनिक या बढ़ा-चढ़ाकर नहीं। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि अधिकार उसी क्षण समाप्त हो जाता है जब खतरा समाप्त हो जाए — जैसे ही हमलावर पीछे हट जाए, निरस्त्र हो जाए, या अन्य प्रकार से खतरा टल जाए, उसके बाद बल का उपयोग निजी रक्षा के रूप में संरक्षित नहीं रहता और स्वयं अपराध बन सकता है। न्यायाधीश हर मामले के तथ्यों पर इसे आंकते हैं, उस समय एक समझदार व्यक्ति ने क्या महसूस किया होता, इस पर ध्यान देते हुए, न कि बाद की दृष्टि से।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आप केवल तभी अपनी रक्षा कर सकते हैं जब आप पर वास्तव में हमला हो चुका हो या आप घायल हो चुके हों।

    तथ्य: अधिकार उसी क्षण शुरू होता है जब उचित खतरे की आशंका पैदा हो जाए, चाहे वह केवल धमकी से हो या हमले के प्रयास से — पहले चोट लगने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है।

  • मिथक: एक बार जब आपको अपनी रक्षा की अनुमति मिल जाए, तो आप जितनी देर चाहें उतना बल प्रयोग जारी रख सकते हैं।

    तथ्य: यह अधिकार उतनी ही देर तक रहता है जितनी देर खतरा बना रहे; जैसे ही खतरा साफ़ तौर पर समाप्त हो जाए, बल का निरंतर उपयोग अब निजी रक्षा के रूप में संरक्षित नहीं रहता।